धर्म-परिवर्तन करने वाले की स्थिति
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के प्रचलित रवैए को वस्तुतः दर्शाता है। अतः यह स्पष्ट हो जाता है कि किस कारण भारतीय ईसाइयों का उल्लेख मुसलमानों तथा सिखों के साथ-साथ नहीं किया गया है। निश्चय ही उनका उल्लेख न किए जाने का कारण यह नहीं है कि वे स्वराज के पक्षधर हैं या नहीं। ऐसी उपेक्षा के बारे में हम केवल यही निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि उनकी कोई गिनती नहीं। यह दुख की बात है कि देश के मामलों में ऐसे प्रबुद्ध संप्रदाय का कोई महत्व और प्रभाव न हो।
ऐसी दशा के क्या कारण हो सकते हैं? निश्चय ही सर्वाधिक उजागर कारण उनकी अल्प संख्या है। उनकी संख्या का वजन इतना कम है कि वे अपने अस्तित्व को सार्वजनिक जीवन में शक्ति के रूप में वैसे अनुभव नहीं करा सकते, जैसे कि मुसलमान अथवा दलित वर्ग करा सकते हैं। लेकिन उनकी नगण्यता का पूर्णतः यह कारण नहीं हो सकता। इसके अन्य कारण होंगे ही। मेरे विचार में इसके दो कारण हैं।
एक तो यह है कि भारत के ईसाई दूसरों के आश्रय पर जीते हैं। उनमें से अधिकांश मिशनरियों के आश्रम में रह रहे हैं। अपनी शिक्षा, अपनी चिकित्सा, अपनी धार्मिक परिचर्चा तथा अपनी अधिकांश छोटी-छोटी जरूरतों के लिए वे सरकार का मुंह नहीं ताकते। वे मिशनों का मुंह ताकते हैं। यदि वे सरकार पर निर्भर करते तो उनसे अपेक्षा की जाती कि वे प्रभावी राजनीतिक गतिविधि के बारे में एकजुट होते और अपने जनसमूह को आंदोलित, शिक्षित व संगठित करते। क्योंकि ऐसे संगठन के बिना कोई भी सरकार उनकी जरूरतों और अपेक्षाओं को पूरा करने की ओर ध्यान नहीं देगी, वे धारा में नहीं हैं और धारा में न होने के कारण वे सार्वजनिक जीवन की ओर ध्यान नहीं देते। अतः जनजीवन में उनकी कोई मान्यता नहीं है।
दूसरा कारण यह है कि भारतीय ईसाई एक विश्रंखल सपं्रदाय है। विश्रंखल शब्द विघटित से बेहतर शब्द है। उनमें बस केवल एक ही समानता है और वह है एक समान प्रेरणा स्रोत। इस एक समानता को छोड़कर अन्य सभी बातें उन्हें अलग-थलग रखती हैं। अन्य सभी भारतीयों की भांति ही ईसाई नस्ल, भाषा और जाति के कारण विभाजित हैं। उनके धर्म में उन्हें एकजुट करने की इतनी शक्ति नहीं है कि वह भाषा, जाति, नस्ल के अंतर को इतना पाट सकें कि वे विभेद मात्र रह जाए। इसके विपरीत उन्हें जोड़ने वाली एकमात्र शक्ति यानी उनका धर्म सांप्रदायिक भेदभावों के ग्रस्त एवं त्रस्त है। नतीजा यह है कि भारत के ईसाई इतने विश्रंखल हैं कि उनका कोई समान लक्ष्य, समान मानस और समान प्रयास हो ही नहीं सकता। तमिल के भारतीय ईसाई की दृष्टि में, एक तमिल हिंदू पंजाब के भारतीय ईसाई के अधिक निकट है। संयुक्त प्रांत का भारतीय ईसाई संयुक्त प्रांत के हिंदू से जितनी निकटता अनुभव करता है,