4
स्पृश्य बनाम अस्पृश्य
अस्पृश्यों की तुलना में स्पृश्यों के आपसी संबंधों की चर्चा अचरज का विषय हो सकती है। यह अचरज अकारण नहीं है। स्पृश्य वर्ग स्वयं में कोई पृथक वर्ग नहीं है, जिसमें सभी स्पृश्यों को एक साथ रखा जा सके। वे स्वयं अनगिनत जातियों में बंटे हुए हैं। हर हिंदू में अपनी जाति के उच्च होने की भावना रहती है। यदि इस विषमता को हम स्वीकार कर लें तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि सभी स्पृश्य जातयों को एक समूह में शामिल करना और उन्हें अस्पृश्यों के विरुद्ध एक पृथक वर्ग के रूप में स्वीकार करना एक ऐसा विभाजन करना है, जिसका कोई अर्थ नहीं हो सकता। अस्पृश्यों की तुलना में स्पृश्यों के इस विभाजन के कुछ कारण हो सकते हैं, पर जहां तक आधुनिक भारत का संबंध है, यह विभाजन बहुत ही वास्तविक और महत्वपूर्ण है।
अगर हम चारों वर्गों के आपसी संबंधों पर एक बार पुनः विचार करें तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि किस प्रकार स्पृश्यों का एक पृथक वर्ग बन गया है और किस प्रकार उसमें अस्पृश्यों से भिन्न और उच्च होने का भाव पैदा हो गया।
सर्वप्रथम तो हमें इस बात को ध्यान में रखना होगा कि श्री गांधी की भांति जो लोग चातुर्वर्ण्य को समाज का एक आदर्श रूप स्वीकार करते हैं, वे या तो चारों वर्णों के आपसी संबंधों के इतिहास को नहीं जानते अथवा किसी भ्रम में हैं या फिर उस प्रयोजन के लिए एक पृष्ठभूमि तैयार कर रहे हैं, जिसे पूरा करना ही उनका उद्देश्य है। क्योंकि तथ्य यह है कि चारों वर्णों ने कभी ऐसे समाज का गठन नहीं किया, जो स्नेहसिक्त भाईचारे पर या सरकारी प्रयास पर टिके आर्थिक संगठन पर आधारित हो। चारों वर्ण केवल आपसी विद्वेष की भावना से अनुप्राणित हैं। इसमें तनिक भी अतिशयोक्ति नहीं होगी, यदि कहा जाए कि हिंदुओं का सामाजिक इतिहास न केवल वर्ग-संघर्ष का सामाजिक इतिहास है, बल्कि यह इतनी कट्टरता से लड़ा गया वर्ग-युद्ध है कि मार्क्सवादी भी उसकी जोड़ के समानांतर दृष्टांत आसानी से