4. स्पृश्य बनाम अस्पृश्य - Page 99

84 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

प्रस्तुत नहीं कर सकेंगे।

ऐसा लगता है कि जो सर्वप्रथम वर्ग-संघर्ष हुआ, उसमें एक पक्ष ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों का था और दूसरा शूद्रों का था।

कात्यायन के श्रौत-सूत्रों में कहा गया है कि जो लोग मंद बुद्धि हैं, जिन्होंने वेदों का अध्ययन नहीं किया है, जो नपुंसक हैं, जो शूद्र हैं, उनके अलावा अन्य लोगों को यज्ञ करने का अधिकार है। वेद के अनुसार (केवल) ब्राह्मणों, राजन्यों तथा वैश्यों को यह (विशेषाधिकार प्राप्त है)।

मनु यह भी कहता है कि (मूल अंग्रेजी की पांडुलिपि में उद्धरण नहीं दिया गया हैऽ)।

मनु यह भी कहता है कि (मूल अंग्रेजी की पांडुलिपि में उद्धरण नहीं दिया गया है)।

इनकी तुलना वैदिक साहित्य में शूद्रों के दर्जे से संबंधित उस काल के निम्नलिखित उदाहरणों तथा विवरणों से कीजिए, जो मनु तथा कात्यायन के काल से भी पुराना है।

प्रो. मैक्स मूलर ने दो उदाहरणों की ओर ध्यान दिलाया है। उनमें दर्शाया गया है कि शूद्रों को ‘गवेधुकाचारू’ जैसे बड़े यज्ञों में शामिल किया जाता था। एक रथकार का है और दूसरा निषादस्थपति का। दोनों ही शूद्र थे।

हम यह कह सकते हैं कि यह महत्व शूद्रों में असाधारण लोगों को दिया जाता रहा होगा। यह निर्विवाद है कि यह केवल रियायत नहीं थी, बल्कि शूद्रों द्वारा भोगा जाने वाला अधिकार था। वेद के ही एक अंग ‘शतपथ ब्राह्मण’ में वह सूत्र दिया गया है, जो ब्राह्मण पुरोहित द्वारा यज्ञकर्ता को बुलाने के बारे में है और वह हवि देने के लिए कहता है। ब्राह्मण के लिए वह कहता है, ‘एहि’ यानी आओ, वैश्य के लिए वह कहता है ‘अगाहि’ (यहां आओ), क्षत्रिय के लिए वह कहता है ‘आद्रव’ (झटपट यहां आओ) और शूद्र के लिए वह कहता है ‘आधाव’ (दौड़कर यहां आओ)।’

यह सूत्र बड़े ही महत्व का है। यह जताता है कि कभी शूद्र भी यज्ञ करने का अधिकारी था। अन्यथा वैदिक निर्देश में शूद्र यज्ञकर्ता के लिए संबोधन-सूत्र को स्थान नहीं मिल सकता था। यदि शूद्र यज्ञ करने का अधिकारी था तो निश्चय ही वह वेद के अध्ययन का भी अधिकारी रहा होगा।

ऽ लेकिन पाठक का ध्यान वर्तमान ग्रंथ-माला के खंड 7 के अध्याय 12 की ओर दिलाया जाता है, जिसमें

मनु के उन नियमों की चर्चा की गई है, जो शूद्रों के अवक्रमण से संबंधित हैं। वे इस स्थान पर संगत

दीख पड़ते हैं - संपादक।