110 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
उपरोक्त सारणी से स्पष्ट है कि 1868-69 और 1869-70 के प्राक्कलन जो 1868-69 के प्राक्कलनों पर आधारित थे से क्रमशः 1,893,508 पौंड और 48,263 पौंड की बचत का अनुमान था। लेकिन जब वर्ष 1868-69 के अंत में बचत की जगह वास्तव में लंबा घाटा हाथ लगा तो उसी समय भारत के वायसराय की गद्दी पर विराजमान हुए लार्ड मेयो को यह विश्वास हो गया कि यदि इन परिणामों के आधार पर उन्होंने बजट बनाया तो उसका अंत बचत की बजाए वास्तविक घाटे में ही होगा। इस वित्तीय आश्चर्य ने मेयो के बजट को भ्रांति में डाल दिया और वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए वित्त वर्ष के मध्य में ही उन्हें कर बढ़ाने और खर्चे में कटौती करने का असामान्य तरीका अपनाना पड़ा।
उनके द्वारा उठाए गए कदमों का सारांश निम्न हैंःµ
1. अतिरिक्त कराधान पौंड
(1) आयकर 1 प्रतिशत से बढ़ाकर
2 ½ प्रतिशत कर दिया गया 320,000
(2) नमक पर कर बढ़ा दिया गया
(मद्रास और बंबई में) 180,000
योग 500,000
2. खर्चो में कटोती
(1) शिक्षा 350,000
(2) सार्वजनिक निर्माण 800,000
योग 1,150,000
अनुमानित घाटा 1,650,000
संकट इतना विकट था कि इन सब उपायों के बावजूद अपने बजट में 1,650,000 पौंड का घाटा दिखाने के अतिरिक्त कोई रास्ता भी न था। घाटा इतना ही होता लेकिन सौभाग्य से अबीसीनिया के युद्ध में वस्तुओं की पूर्ति से हुए भावी मुनाफे और पुराने हिसाब के चुकता होने के कारण यह विशाल घाटे को थोड़े मुनाफे में बदल सके। अपने प्रयत्नों की सफलता पर प्रसन्न लार्ड मेयो अब आश्वस्त हो चुका था कि केन्द्रीय वित्त प्रणाली में कुछ न कुछ खोट अवश्य है। अतः इस प्रणाली को खत्म करने का इच्छुक न होते हुए भी उसने समझौते के रूप में प्रांतीय वित्त योजना का उद्घाटन कर केन्द्रीय वित्त प्रणाली को सुधारने का साहसिक कदम उठाया। इस योजना के विकास के बारे में हम भाग- II में चर्चा करेंगे।