समझौता 109
वित्तीय व्यवस्था को शल्य क्रिया द्वारा ठीक किए जाने का कड़ा विरोध करते रहे। लेकिन इस दौरान व्यवस्था के निरोग होने के कोई आसार नजर नहीं आए। इसके विपरीत, शल्यक्रिया के अभाव में व्यवस्था अधिक बीमार होने लगी। करों की बढ़ोतरी और खर्चों में कटौती के बावजूद इंग्लैंड से भेजे गए भारतीय कोष के तीनों कुलपति (चांलसर) 1860-1870 के दशक के दौरान मात्र तीन वर्षों की बचत ही दिखा पाए। दूसरी ओर लगातार घाटे से पैदा हुई शर्मिंदगी के साथ-साथ देश की सार्वजनिक वित्तीय प्रणाली में मितव्ययता और अनुशासन पैदा करने की गरज से लागू की गई बजट व्यवस्था न केवल कटौती के कारगर हथियार के रूप में असफल रही बल्कि अत्यधिक केन्द्रीकरण के दबाव के चलते अनुशासन पैदा करने के हथियार के रूप में भी बेकार साबित हुई। फलस्वरूप वित्तीय व्यवस्था दिशाहीनता के पाश में फंस चुकी थी।
बजटीय आकलन की शुद्धता के बारे में जारी किए गए विस्तृत सर्कुलर और आदेशों के बावजूद वित्त मंत्रियों को अजीबोगरीब स्थिति का सामना करना पड़ता था। क्योंकि बजट की शुरुआत तो मोटी बचत के प्राक्कलन से होती थी लेकिन उनका अंत हमेशा वास्तविक घाटे से होता था। अनुमानित और वास्तविक घाटे का अंतर निम्न सारणी से स्पष्ट हो जाता हैःµ
सरकारी वित्त में गड़बीड़ी *
| o"kZ | vuqekfur ?kkVk cpr ikSaM |
okLrfod ?kkVk cpr ikSaM |
|---|---|---|
| 1866&67 1867&68 1868&69 1869&70 |
&66]700 1]628]522 1]893]508 48]263 |
&2]307]700 &923]720 &2]542]861 &1]650]000 vuqekfur |
*. हंटर, डब्ल्यू. डब्ल्यूः लाइफ ऑफ मेयो, दूसरा अंक, पृष्ठ 7-8 सारणी में दिए वास्तविक घाटे की
संख्याएं भारत सरकार के सचिव श्री चैपमैन द्वारा लार्ड मेयो की योजना के संबंध में बंबई सरकार को
लिखे 17.8.1870 के सर्कुलर पत्र में दी गई संख्याओं से भिन्न हैं। चैपमैन के अनुसार वास्तविक घाटे
की संख्याएं निम्न हैंःµ
1866-67 में वास्तविक घाटा था µ 2.517,491 पौंड
1867-68 में वास्तविक घाटा था µ 1,007,695 पौंड
1868-69 में वास्तविक घाटा था µ 2,774,031 पौंड
सर्कुलर पत्र के संदर्भ हेतु देखें स्थानीय सरकारों की वित्तीय शक्तियों के विस्तार पर आलेख, पृ. 243