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नियत बजट 123

प्रांतीय बजट के स्वरूप की समीक्षा करने तथा उनमें शामिल आमदनी और खर्चो का ध्यान रखने के बाद हम वर्ष 1870-71 में निर्धारित उनकी संरचना की विशेषता पर ध्यान देंगे। इस विशेषता को जानने का सबसे सही तरीका यही होगा कि हम उन समस्याओं की तह में जाएं जो प्रांतीय बजट तैयार करने वालों के सामने आईं और उन्होंने कैसे उन्हें सुलझाया। प्रांतीय बजटों को लेकर उठे विवाद की जानकारी के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि विवाद प्रांतीय बजटों में रखे जाने वाले खर्चे के मदों को लेकर नहीं था क्योंकि यह बहुत पहले ही तय हो चुका था कि साम्राज्यवादी बजट में कुछ खर्चे नितांत स्थानीय प्रकृति के हैं। उनके साम्राज्यवादी बजट के असंतुष्ट हिस्सा होने पर आम सहमति थी। इस बात पर भी आम सहमति थी कि इन खर्चों के बारे में कुछ न जानने वाली भारत सरकार या तो एक ऐसे गैर-जरूरी खर्चे को सत्यापित करने पर मजबूर थी जिसे एक विभाग का अध्यक्ष लापरवाहीपूर्वक पास करता रहा है बिना इस पर ध्यान दिए कि जनता के पैसे की बरबादी हो रही है, या फिर अचानक कृपणता के अत्यधिक सावधान नजरिए द्वारा या लोक राजस्व की दशा से संचालित कृपणता के माध्यम से इन खर्चों को पास नहीं करते और लाभकारी

खर्चों पर रोक लगा देते। दोनों में से कोई भी तरीका शरारतपूर्ण कार्यवाइयों को जन्म दे सकता था। अतः आम सहमति से तय किया गया कि अपनी अनभिज्ञता के चलते केन्द्रीय सरकार जिन विषयों पर अंकुश लगाने में असमर्थ है उन्हें केन्द्र सरकार के सीधे अधिकार क्षेत्र से निकाल कर प्रांतीय सरकारों के जिम्मे सौंप दिया जाए। इस तरह समस्या का एक पहलू मात्र स्थितियों के दबाव के कारण ही सुलझ गया। जिस मुद्दे पर सबका ध्यान केन्द्रित था वह प्रांतीय सरकारों को बजट में शामिल खर्चों की पूर्ति के लिए दी जाने वाली राशि की समस्या थी। इस बात पर सब सहमत थे कि प्रांतीय सरकारों के बजट में शामिल की गई सेवाओं से होने वाली आय उन सरकारों के हिस्से में ही जानी चाहिए। यह प्रणाली अपनाने के पक्ष में दो तरह के तर्क पेश किए गए। अच्छे वित्त के इस सिद्धांत के आधार पर प्रांतीय सरकारों द्वारा स्वयं चलाई जा रही सेवाओं से हुई आय को ले लेना उचित ही था। लेकिन इस निर्णय के पीछे एक अन्य दमदार कारण भी था। प्रांतीय बजट की अवधारणा के पीछे मुख्य विचार वित्त के न्यायपूर्ण तथा मितव्ययी प्रबंध के प्रति प्रांतीय सरकारों की रुचि जगाना था। ऐसा करने का एक रास्ता उनके द्वारा प्रबंधित सेवाओं से हुई आय को उनके हवाले करना था। लेकिन यह आय प्रांतीय खर्चों की पूर्ति के लिए आवश्यक कुल राशि का इतना छोटा हिस्सा थी कि प्रांतीय बजटों में संतुलन बनाने की समस्या बनी ही रही। ऐसे में समस्या सुलझाने के लिए भारत सरकार के समक्ष दो संभावित रास्ते थेःµ या तो साम्राज्यवादी राजस्व के कुछ संसाधनों को प्रांतीय सरकारों के इस्तेमाल के लिए उन्हें अन्तरित कर दिया जाए या साम्राज्यवादी कोष से निश्चित राशि दी जाए। कुछ समय के लिए यह निश्चित करना मुश्किल हो गया कि दोनों में से कौन-सा रास्ता ज्यादा सही है क्योंकि वे न केवल विशेषताओं में असमान थे बल्कि वे संबंधित