124 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
विभिन्न पक्षों के लिए अलग-अलग अर्थ रखते थे। प्रांतीय सरकार के लिए स्थिर मदों की तुलना में राजस्व का बंटवारा ज्यादा फायदेमंद था क्योंकि इससे उसकी वित्तीय स्थिति में ज्यादा लोच की संभावना थी। इसके विपरीत राजस्व के बंटवारे का मसला केन्द्रीय सरकार की नजर में गंभीर परिणामों से ग्रस्त था। भारत की पूर्व और वर्तमान वित्तीय स्थिति केन्द्र सरकार द्वारा राजस्व के स्रोतों के बंटवारे के पक्ष में कतई नहीं थी। दूसरी ओर भविष्य में उसकी स्थिति उतनी ही असंतुष्ट दिखाई देती थी जितनी भूतकाल में थी अतः वह संसाधनों पर अपना स्वामित्व बनाए रखना चाहती थी ताकि भविष्य में आने वाले संकट से निपटा जा सके। दूसरी ओर दूसरे विकल्प के तहत भारत सरकार अपने संसाधनों पर अंकुश गंवाए बिना प्रांतों को उचित राशि दे सकती थी। यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि अपनी संवैधानिक हैसियत के कारण देश के समस्त राजस्व के प्रबंधन और उपभोग का अधिकार भारत सरकार को ही था। अतः प्रांतों की वित्तीय समस्याओं संबंधी कोई भी समाधान केन्द्र के हितों को ध्यान में रखते हुए ही किया जा सकता था। ऐसी स्थिति में प्रांतीय बजट की संरचना संबंधी मुख्य समस्या के समाधान के रूप में राजस्व के नियतन की अपेक्षा कार्य नियतन की विधि का इस्तेमाल किया गया।
चूंकि प्रांतीय बजटों को बराबरी में लाने के लिए साम्राज्यवादी कोष से राशि के नियतन की विधि अपनाई गई थी अतः 1871-72 में लागू की गई व्यवस्था को इस अध्ययन में नियतन द्वारा बजट की विधि कहा गया है।
इस सिद्धांत पर आधारित 1871-72 में निर्मित प्रांतीय बजट वर्ष 1876-77 तक जारी रहे। 1871-72 वर्ष के लिए प्रांतीय सरकारों को दी गई राशि को सावधि तथा आवर्ती घोषित कर दिया गया। वे आवर्ती अवश्य थीं लेकिन सावधि नहीं थीं। क्योंकि शुरुआत से ही प्रत्येक वर्ष भारत सरकार प्रांतीय बजट में शामिल किए गए खर्चों में किए गए इन परिवर्तनों के अनुसार साम्राज्यवादी नियतन को जरूरत के हिसाब से या तो बढ़ाना पड़ा या कम करना पड़ा। 1871-72 से 1876-77 तक विशेष कार्यों के लिए मान्य नियतन में प्रगतिशील परिवर्तन निम्नलिखित तालिकाओं में दर्शाए गए हैंःµ
वर्ष 1871-72 के लिए प्रांतों को साम्राज्यवादी नियतन का विवरण
नियतन की गई धन राशि नियतन का उद्देश्य ब्यौरा कुल राशि
रु. रु. 1 2 3 मूल नियतन 1,19,79,000 जमा किए गए
कब्रिस्तान के प्रतिष्ठानों के लिए 4,000