130 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
1 2 3 सांप के जहर के आयोग, प्रतिष्ठानों तथा
आपातकालीन जरूरतों पर व्यय 6,000
मर्दुमशुमारी रजिस्टर के लिए अनुदान 49,482 58,753
1,11,33,753 कटौती की गई
हटाए गए लाइट हाउस और लाइट
शिप पर नियतन 1,769
असम की नगरसुधार निधि के संबंध में नियतन 17,711
तेजपुर पागलखाने में हस्तांतरित पागलों पर
वार्षिक व्यय 2,700 22,180 कुल नियतन 1,11,11,573
समय-समय पर बजट में शामिल सेवाओं का तथा नियतन बजट की व्यवस्था के कार्यकाल के दौरान साम्राज्यवादी कोष द्वारा आबंटित राशि का पूरा ब्यौरा मिलता है। अब यह देखना है कि क्या नियतन योजना के तहत व्यवस्था सफल रही? सफलता के मापदंड पर हमेशा बहस हो सकती है क्योंकि एक दृष्टिकोण से जो सफल नजर आ रहा हो, दूसरे दृष्टिकोण से वही असफल नजर आ सकता है। लेकिन सफलता के सवाल पर बहस को टाला नहीं जा सकता क्योंकि प्रांतीय वित्त के फैलाव के दौरान पहले कदम की सफलता के आधार पर ही दूसरे कदम को बढ़ाया गया था। चूंकि सफलता की परिभाषा दृष्टिकोण के हिसाब से बदल जाती है, अतः अपनी खोजबीन के लिए हमें दृष्टिकोणों की जानकारी ले लेना उचित होगा। अतः हम उन पक्षों की छानबीन करें जिनके दृष्टिकोण प्रांतीय वित्त के स्वरूप को तय करने में अहम भूमिका रखते थे और परिणामों को लेकर जिनके संतोषजनक विचारों के बिना नया कदम उठाना संभव नहीं था। स्पष्टतः भारत सरकार और प्रांतीय सरकार दो मुख्य पक्ष थे। लाजिमी है कि दोनों के विचार भले ही परस्पर विरोधी हों पर अलग-अलग जरूर थे। भारत सरकार के दिमाग में अहम् सवाल था कि हस्तांतरण साम्राज्यवादी कोष को कितना फायदा पहुंचाएगा। उधर प्रांतीय सरकारों को चिंता थी कि क्या भारत सरकार द्वारा प्रस्तुत संसाधन बजट में शामिल खर्चों के प्रबंधन की जिम्मेदारी निर्वाह करने में सक्षम होंगे। यह स्पष्ट है कि प्रांतीय सरकारें तक तब विशेष नियतन के तहत साम्राज्यवादी खर्चे का प्रबंधन नहीं करतीं जब तक वह इससे आश्वस्त नहीं हो जातीं, कि नियतन उचित मात्रा में किया गया है। इसी प्रकार साम्राज्यवादी सरकार