नियत बजट 131
भी तब तक अन्तरण करने को तैयार नहीं थी जब तक कि प्रांतीय सरकारें खर्चे का प्रबंधन साम्राज्यवादी सरकार द्वारा सीधे प्रबंधन में आने वाली लागत से कम लागत में करने को तैयार नहीं होती। अतः योजना तत्व को बरकरार रखने और विस्तारित करने में दो कारण प्रमुख रहेµप्रांतों का उचित नियतन तथा साम्राज्यवादी कोष को लाभ। तीसरे तत्व के रूप में प्रांत की जनता को लिया जा सकता है जिसकी सहमति तत्कालीन परिस्थिति में आवश्यक हो गई थी। आम जनता का दृष्टिकोण क्या रहा होगा? यह पूछने का सवाल नहीं है। दूसरी ओर, राजनीतिक प्रगति की लोकप्रिय मांग से परिचित व्यक्ति आसानी से कल्पना कर सकता है कि करदाताओं का सरोकार न तो साम्राज्यवादी सरकार और न ही प्रांतीय सरकारों की भलाई से था, उनका सरोकार तो खर्चों के विभिन्न मदों के तहत दी गई राशि के वितरण से था और यदि योजना की प्रगति का आधार योजना के परिणामों पर जन सहमति को बनाया गया होता तो संभव है कि प्रांतीय वित्त का विकास विभिन्न स्तरों पर होता।
उस समय यह सुझाव भी आया कि देश के वित्तीय रख-रखाव की दिशा तय करने में देश की जनता की भी भागीदारी होनी चाहिए। अस्थाई वित्त योजना की घोषणा करने वाले 14 दिम्बर, 1870 के संकल्प के पैरा 19 में सरकार ने घोषणा की किःµ
‘‘प्रत्येक स्थानीय सरकार गवर्नर जनरल की विधान परिषद् में बनी वित्तीय व्यवस्था के समान स्थानीय विधान परिषद् के समक्ष तैयार की गई वित्तीय व्याख्या के साथ-साथ अपना प्रांतीय सेवा प्राक्कलन और लेखा स्थानीय गजट में छपवाएगी।’’
यदि यह सुझाव स्वीकार कर लिया गया होता तो भारत सरकार और प्रांतीय सरकारों के बीच वित्तीय आयोजन तय करने में करदाता की भी भूमिका होती। लेकिन इस सुझाव को क्रियान्वित करने में कुछ कानूनी अड़चने थीं। यदि परिषद् में बजट को रखा जाता और उस पर बहस चलती तो यह प्रक्रिया भारतीय परिषद् कानून (24 और 25 विक, सी. 67) की धारा 38 के प्रतिकूल होती और इसलिए गैर-कानूनी होती। यदि बजट में कर समाहित होता तो ऐसा नहीं होता। क्योंकि कानून में स्पष्ट तौर से कहा गया है कि कानूनी उद्देश्य के अलावा किसी अन्य कार्य के लिए विधान परिषद् की कार्यवाही नहीं चलाई जा सकती। दूसरी तरफ यदि बजट पर बहस नहीं हो सकती तो उसका इस तरीके से प्रचार करने का कोई मतलब नहीं क्योंकि सरकारी गजट में बजट का प्रकाशन करके उसे सुरक्षित नहीं बनाया जा सकता था। इन कठिनाइयों के समाधान के तौर पर मद्रास की सरकार ने भारत सरकार के सामने प्रस्ताव ख्1, रखाःµ
- भारत सरकार के वित्त विभाग को लिखा पत्र, संख्या 147, दिनांक 18 अप्रैल, 1871