134 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
से आय तथा प्राप्तियों का संतुलन बनाए रखने में सफल रहा। इस सवाल का जवाब स्पष्ट शब्दों में नहीं दिया जा सकता क्योंकि जिन संपूर्ण संसाधनों और परिवर्तनों की ओर उपरोक्त आंकड़े इंगित करते हैं कि उनमें प्रांतीय प्रबंधन के लिए अलग रखे आय और नियतन से भी अधिक शामिल है। साम्राज्यवादी नियतन और शामिल की गई सेवाओं से हुई आय के अतिरिक्त उनमें स्थानीय निधियों का हिस्सा भी शामिल था। उल्लेखनीय है कि प्रांतीय वित्त को साम्राज्यवादी वित्त से अलग करने के बहुत पहले ही 1855 में ब्रिटिश इंडिया में साम्राज्यवादी वित्त और प्रांतीय वित्त को अलगखानों में बांटा जा चुका था। जब स्थानीय निधियों को अलग किया गया तो उसका फौरी तौर से प्रबंधन अनेक प्रांतीय सरकारों के जिम्मे आ गया और दो अलग-अलग श्रेणियों में बांट दिया गयाµ (अ) वह धन राशि जो कानून अथवा परंपरा के तहत उन्हीं जिलों तथा उन्हीं मदों पर खर्च की जानी थी जिन जिलों से और जिन मदों के लिए वह एकत्रित की गई थी, (ब) वह धनराशि जो पूरे प्रांत के स्तर पर एकत्रित की गई थी और जिसके खर्चे का एकमात्र अधिकार प्रांतीय सरकार को ही था। जब प्रांतीय वित्त योजना का शुभारंभ हुआ तो श्रेणी की स्थानीय निधि को प्रांतीय निधि में मिला देना ही व्यावहारिक समझा गया। यह जान पाना कठिन है कि प्रांतीय संसाधनों में कुल कितनी बढ़ोतरी हुई लेकिन तत्कालीन ख्1, वित्त मंत्री सर जान स्ट्रेची की मान्यता है कि यह बढ़ोतरी ‘‘साधारण थी अतः नई व्यवस्था के वित्तीय परिणामों को किसी खास स्तर तक प्रभावित करने में असमर्थ थी। ख्2, ’’
साम्राज्यवादी कोष को हुए फायदे की मात्रा के सवाल पर हमें बहुत समय तक उलझे नहीं रहना चाहिए। प्रांतीय सरकारों द्वारा सेवाओं के मितव्ययी प्रबंधन से हुए फायदे की चर्चा हम प्रांतीय वित्त के विकास के दूसरे चरण को लाने में प्रभावी महत्त्वपूर्ण कारणों की जांच करते समय करेंगे। साम्राज्यवादी कोष को हुए सीधे लाभ का प्रभाव प्रांतीय कटौती के रूप में हम देख चुके हैं। उल्लेखनीय है कि भारत सरकार ने अन्तरित सेवाओं के बदले 10 लाख पौंड स्टर्लिंग तक की वार्षिक छूट की योजना बनाई थी। लेकिन भारत सरकार को जल्दी ही महसूस हो गया कि इन कटौतियों के बदले प्रांतीय सरकारों को कर लगाने की जरूरत पड़ जाएगी। सैनिक विद्रोह के समय से ही भार बढ़ चुका था और अब इस भार को प्रत्यक्ष रूप से केन्द्रीय कर अथवा अप्रत्यक्ष रूप से प्रांतीय करों के माध्यम से और अधिक बढ़ाने में अनिच्छुक भारत सरकार ने प्रांतीय नियतन में मांगी जा रही छूट को 1,000,000 पौंड कर 350,000 पौंड से घटा करने का निर्णय लिया। यदि हम विशेष परिस्थितियों
- 1877-78 के वित्तीय वक्तव्य में संलग्न 15 मार्च, 1877 की उनकी कार्यवाही देखें।
- 1876 से इस मिश्रण को छोड़ दिया गया था ताकि भारत सरकार पुरानी व्यवस्था की तुलना में नई
व्यवस्था के वित्तीय परिणामों को जान सके।