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नियत बजट 133

अतः सुझाव वापस ले लिया गया और 1921 तक उसे लागू नहीं किया गया। चूंकि साम्राज्यवादी और प्रांतीय सरकारों के बीच वित्तीय समझौते की रूपरेखा तय होते समय जनता की आवाज को कोई महत्व ख्1, नहीं दिया गया, अतः यह बात कोरी महत्व की नहीं कि अगर जनता की आवाज को महत्व दिया गया होता तो परिणामों के प्रति उनकी रुचि भी होती। जहां तक पिछले परिणामों का सवाल है तो हमें उन परिणामों की जानकारी लेनी है जिनमें समझौते के बाकी दो पक्षों की रुचि थी और ये हैंःµ साम्राज्यवादी कोष को लाभ तथा प्रांतीय सरकारों को मिलने वाली समुचित राशि। पहले प्रांतीय सरकार को मिलने वाली राशि की उचित मात्रा की परीक्षा करने के लिए उस अवधि के परिणामों को प्रांतीय बजट व्यवस्था के दायरे में लाए गए प्रांतों में से प्रत्येक प्रांत के वित्त में हुए वार्षिक घाटे और बचत से आंका जा सकता है।

प्रांतीय बचत और घाटा

प्रांत 1871-72 1872-73 1873-74 1874-75 1875-76 1876-77

पौंड पौंड पौंड पौंड पौंड पौंड सी. पी. 20,988 8,423 2,268 13,108 8,307 16,800 (सेंट्रल प्रोविंसेज)

ब्रिटिश बर्मा 27,634 33,832 9,922 21,889 5,471 5,100 असम - - - 5,159 590 9,833 बंगाल 180,622 74,622 393,955 271,044 27,397 46,998 उत्तर पश्चिमी

प्रांत और अवध 31,595 64,836 36,358 11,693 29,945 128,501 पंजाब 109,828 28,008 33,347 117,644 92,724 26,908 मद्रास 40,787 19,264 56,381 4,303 14,210 504 बंबई 65,553 128,805 64,373 9,929 18,354 140,718 वर्ष विशेष के लिए भारत सरकार के वार्षिक वित्त और राजस्व लेखा से तैयार।

इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि आवृत्ति और मात्रा में घाटे की तुलना में बचत इतनी अधिक थी कि घाटे को आसानी से एकत्रित बचत द्वारा पूरा किया जा सकता था, साथ की इस बचत के खत्म होने का खतरा भी नहीं था। हालांकि प्रांतीय सरकारों की इस खुशहाली के कारण समझाने में सतर्कता बरतनी होगी। हमें यह पता करना है कि क्या वास्तव में प्रांत साम्राज्यवादी सरकार द्वारा नियतन

  1. यह मुद्दा कि विकेन्द्रीकरण का तब तक विसतार न किया जाए जब तक कि जनप्रतिनिधियों की राजनीतिक

तथा वित्तीय शक्तियां कम न की जाएं 1908 तक नहीं उठाया गया। इस मुद्दे को स्वर्गीय माननीय श्री

गोखले ने भारत के विकेन्द्रीयकरण के रायल कमीशन के समक्ष गवाही देते हुए कहा था।