136 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
इससे पता लगता है कि 1870-71 की अपेक्षा 1875-76 में 488,188 पौंड की प्राप्तियों से बढ़ोतरी मुख्यतः उत्तर पश्चिमी प्रांतों, पंजाब और मद्रास पे्रसीडेंसी में भूमि राजस्व पर 6 ¼ प्रतिशत चुंगी लगा कर, पंजाब तथा मद्रास में भूमि राजस्व में 5 प्रतिशत चुंगी बढ़ा कर, बंगाल में सड़क चुंगी लगा कर और असम में भूमि राजस्व पर 3 प्रतिशत के स्थान पर 6 ¼ प्रतिशत कर लगाए गए। बंबई प्रेसीडेंसी में कुछ वर्ष पहले 6 ¼ प्रतिशत चुंगी लगाई गई थी जो उपरोक्त सूची में शामिल नहीं है। एकमात्र प्रांत जिसने किसी तरह की अतिरिक्त चुंगी नहीं लगाई सेंट्रल प्रोविंस था। हालांकि यहां भी 1870 में भूमि राजस्व पर 6 ¼ प्रतिशत चुंगी का विचार व्यावहारिक तो माना गया था लेकिन उचित नहीं।
यह तर्क दिया जा सकता है कि यदि प्रांतीय वित्त व्यवस्था भविष्य में कर लगाने की आवश्यकता को खत्म नहीं कर सकती तो उसका क्या फायदा? यदि कर लगाया जाना इतना ही जरूरी था तो साम्राज्यवादी सरकार ने खुद यह जिम्मेदारी उठाने की बजाय प्रांतीय बजट के रूप में प्रांतीय सरकारों के मत्थे क्यों डाल दी? इसके जवाब में कहा जा सकता है कि प्रांतीय वित्त की अच्छाईयां दूसरी दिशाओं में देखी जा सकती हैं और सही जगह पर यह दर्शाया जाएगा कि प्रांतीय वित्त की व्यवस्था सही थी। यद्यपि उसकी स्थापना के बाद करों में थोड़ी बहुत वृद्धि अवश्य हुई। वास्तव में कर के खिलाफ सामान्य आवाज उठाना गैर-बुद्धिमत्तापूर्ण कदम होगा, क्योंकि बिना मूल्य दिए फायदा नहीं उठाया जा सकता। लेकिन कर लगाए जाने का विरोध नहीं करना भी अन्यायपूर्ण होगा क्योंकि सवाल कर लगाए जाने का नहीं था बल्कि कर की असमानता का था। प्रांतीय वित्त के घाटे की पूर्ति के लिए अपनाए गए तरीकों के तहत पहले से ही करों के बोझ से दबे करदाताओं, भूस्वामियों पर नए कर और चुंगियां लाद दी गईं प्रांतीय बजट में शामिल सेवाएं जिनके लिए ये कर और चुंगी लगाई गई थी, यद्यपि स्थानीय कही गई थीं लेकिन वे उतनी ही स्थानीय थीं जितनी साम्राज्यवादी सरकार द्वारा अपने पास रखी गई सेवाएं। दूसरी ओर क्षेत्रों की दृष्टि से प्रांतीय सेवाएं प्रांतों के लिए उतनी ही भारी थीं जितनी कि केन्द्र के लिए। फिर भी स्थानीय क्षेत्रों पर लगाए गए करों और चुंगी के द्वारा उन्हें वित्तीय सहायता दी गई थी मानों कि वे उन्हें सीधे फायदा पहुंचा रहे हों, जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं था। यह और भी अधिक सोचनीय है क्योंकि कटौती की आवश्यकता, जिसके कारण कर और चुंगी लगानी पड़ी, उस समय पड़ी जबकि आयकर हटा दिया गया था। न्यायसंगत तो यही था राज्य और कर दाता की राहत के लिए आय कर लागू रहता। लेकिन भारत सरकार के वित्तीय सचिवालय से न्याय बहुत दिनों तक गायब रहा। बहुत थोड़े लोगों ने ही इसकी परवाह की, लेकिन किसी ने भी इसे प्रांतीय अथवा स्थानीय वित्त जुटाने का एक अहम् हिस्सा नहीं माना। और चूंकि इसे मान्यता नहीं मिल पाई अतः प्रांतीय सरकारों द्वारा इसका उल्लंघन प्रांतीय वित्त के विकास के आड़े नहीं आया।