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निर्दिष्ट राजस्व बजट

(1877-78 से 1881-82 तक)

प्रांतीय बजट योजना जिसके दूसरे चरण का हम आज अध्ययन करेंगे, चालू करते समय मिली-जुली प्रतिक्रिया हुई थी। असीमित उम्मीदें लगाई गई थीं, हालांकि शंका की भावना भी दिल में छिपी थी। इस योजना से बंधी उम्मीदों का जायजा सन् 1870 में योजना का उद्घाटन करते समय दिए गए सर रिचर्ड टेम्पिल की टिप्पणी में लिया जा सकता हैःµ

‘‘हमें उम्मीद है कि यह छूट (राजस्व और खर्च पर बढ़े नियंत्रण में) स्थानीय सरकारों को खर्चों में कटौती लागू करने तथा उसके अध्ययन में रुचि पैदा करेगी, उन्हें समय-समय पर लोगों द्वारा सबसे अधिक ग्राह्य या लोक आलोचना से मुक्त तरीकों से अपनी स्थानीय आय को बढ़ाने का प्रलोभन देगी, वित्तीय संसाधनों के विकास को सम्मान देते हुए करदाता वर्ग और प्रशासकीय अधिकारियों के बीच बेहतर समझ पैदा करने में सक्षम होगी, जनता को प्रांतीय वित्त में व्यावहारिक हिस्सा लेने का पाठ पढ़ाएगी, जनता को धीरे-धीरे स्थानीय स्वशासन की ओर अग्रसित करेगी, और इस तरह प्रशासकीय तथा वित्तीय बेहतरी का माहौल पैदा करेगी।’’ ख्1,

इन उम्मीदों के साथ-साथ सर टेम्पिल ने इस अवसर का फायदा उठाते हुए परिषद को असफलता के लिए भी तैयार रहने को कहा क्योंकि उन्होंने आगे लिखाःµ

‘‘मेरे द्वारा व्यक्त उम्मीदें भले ही कितनी ही आशावादी तथा आत्मविश्वासपूर्ण हों, आखिर हैं तो उम्मीदें ही, और दूसरी उम्मीदों की तरह हो सकता है यह भी पूरी न हों पाएं। लेकिन यह सब घटित होने दीजिए, मुझे जरा भी शंका नहीं

  1. 1860-61 से 1873-74 के अधिकारिक वर्षों के लिए जारी वार्षिक वित्त वक्तव्य, परिशिष्ट के साथ,

कलकत्ता, सरकारी मुद्रण के अधीक्षक का कार्यालय 1873, पृ. 348