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निर्दिष्ट राजस्व बजट

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अतः इसकी उपयोगिता पर पूर्ण विश्वास और सहायता की भावना से प्रेरित हो भारत सरकार ने स्थानीय नियंत्रण योग्य अथवा स्थानीय प्रकृति के अतिरिक्त सेवाओं को प्रांतीय बजट में शामिल करने का निर्णय लिया। लेकिन पहले से मौजूद सेवाओं में अतिरिक्त सेवाएं शामिल करने से प्रांतीय सरकारों को दी जाने वाली निधियों की समस्या ज्यादा गंभीर हो गई। पहली अवधि में शामिल की गई सेवाओं से हुई आय और उन पर होने वाले कुल खर्चे का अंतर बहुत कम था। इस अंतर को पूरी तरह से नियतन के माध्यम से पाटने का तरीका विस्तारित योजना की सफलता के लिए उपयुक्त नहीं समझा गया। नियतन बजट की व्यवस्था का मुख्य दोष इसकी दृढ़ता में निहित था। प्रांतों ने इसे पूर्ति का साधन बनाने से इंकार कर दिया क्योंकि उनके द्वारा प्रबंधित सेवाओं पर खर्च तो बढ़ता गया, लेकिन उसकी भरपाई के लिए मिलने वाली नियतन राशि स्थिर ही रही। योजना को एक कदम आगे बढ़ाने के लिए जिम्मेदार सर जान स्ट्रेची योजना की इस कमजोरी से भलीभांति परिचित थे। प्रांतों को स्थिर नियतन के स्थान पर वह राजस्व के कुछ ऐसे स्रोत देना चाहते थे जिनसे होने वाली आय अच्छे प्रबंधन पर निर्भर थी। निस्संदेह ऐसा करने के पीछे उनका उद्देश्य प्रांतीय सेवाओं की बढ़ती आवश्यकताओं को ज्यादा बेहतर तथा ज्यादा लचीला बनाना था। लेकिन नियतन के स्थान पर निर्दिष्ट राजस्व व्यवस्था प्रतिस्थापित करने के पीछे भी एक अन्य और उनकी नजर में ज्यादा जरूरी कारण था। यह आम धारणा बन चुकी थी कि मितव्ययिता अच्छे प्रबंधन का परिणाम है लेकिन अच्छा प्रबंधन होता क्या है यह कुछ लोग ही जानते थे। सबसे पहले सर जान स्ट्रेची ने ही अच्छे प्रबंधन के अपने विचार को सही भाषा में परिभाषित किया। इस परिभाषा का उनके बाद से लगातार प्रांतीय वित्त के विकास में बढ़-चढ कर इस्तेमाल किया गया। उनकी नजर में वित्त का अच्छा प्रबंधनःµ

‘‘सैकड़ों हजारों मील दूर कलकत्ता या शिमला में बैठे वित्तीय विभाग अथवा सर्वोच्च

सरकार के किसी अन्य विभाग के महानुभावों द्वारा की गई कार्यवाही नहीं है यह

आंकड़ों की जांच और सर्कुलर लिखना भी नहीं है बल्कि स्थानीय सरकारों को

कार्यकुशल प्रशासन देने में सीधी तथा व्यक्तिगत रुचि लेने को प्रेरित करना है।’’ ख्1,

और ऐसा सोचने के लिए उनके पास हाल के अनुभव का शक्तिशाली आधार था क्योंकि पिछले चरण के परिणामों को लेते हुए प्रांतों ने साम्राज्यवादी शासनकाल की तुलना में न केवल कम लागत पर सेवाओं पर प्रबंधन किया बल्कि दूर स्थित अनभिज्ञ और इसलिए नपुंसक सतर्कता वाली साम्राज्यवादी सरकार की तुलना में प्रांतों की सरकारों द्वारा अपेक्षाकृत अधिक राजस्व जुटाया।

  1. वित्त वक्तव्य, 1877-78