138 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
है यह कदम ब्रिटिश इंडिया के साम्राज्यवादी बजट के लिए फायदेमंद ही होगा। क्योंकि वर्तमान में इसका सीधा प्रभाव सामान्य कोष से घोषित कुछ महत्त्वपूर्ण नागरिक मदों पर होने वाले खर्चों को सीमित करने पर पड़ेगा। ये वही मद है जहां समय के विकास के साथ-साथ व्यय की मांग भी लगातार बढ़ती रही है, और जिनमें सर्वोच्च केन्द्रीय सत्ता स्थानीय अधिकारियों की आवश्यकताओं पर अंकुश लगाने में सबसे कम सफल रही है।’’
हालांकि वास्तविक परिणाम इन साधारण उम्मीदों से कहीं आगे थे और प्रांतीय वित्तीय संस्थान को शक की नजर से देखने वालों की शंकाओं को दूर करने के लिए जरूरी थे। यदि हम स्वयं को भारत सरकार अथवा प्रांतीय सरकारों को तुरंत प्रभावित करने वाले मुद्दों तक ही सीमित रखें तो यह भलीभांति सिद्ध हो जाएगा कि प्रांतीय प्रबंधन केन्द्रीय प्रबंधन से ज्यादा मितव्ययी था। यदि हम साम्राज्यवादी सरकार के अधीन रहने पर सेवाओं पर होने वाले खर्चे को प्रांतीय सरकार को हस्तांतरित किए जाने के बाद सेवाओं पर आए खर्चे से तुलना करें तो प्रांतीय प्रबंधन की उच्च स्तर की मितव्ययिता सिद्ध हो जाती है।
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5]606]248 5]587]779 5]821]438 6]030]214 5]856]310 5]197]250 ---izkarh; izca/u ds varxZr caxky ds vdky ij gqvk O;; lfEefyr ugha gSA 4]835]238 4]964]407 5]329]180 5]379]509 5]135]677 |
1876 की साम्राज्यवादी प्रांतीय और स्थानीय वित्त पर टिप्पणी के सरकारी खंड से तैयार।