5 निर्दिष्ट राजस्व बजट - Page 156

निर्दिष्ट राजस्व बजट

141

एक लंबे समय तक सर जान स्ट्रेची यह मानते रहे कि जब तक प्रांतीय सरकारों ने भारत सरकार के लिए राजस्व एकत्रित किया तब तक उन्होंने राजस्व की चोरी रोकने पर ध्यान नहीं दिया, जबकि वे ऐसा जरूर करती यदि राजस्व उन्हें अपने फायदे के लिए एकत्रित करना होता, या जैसा उन्होंने कहाःµ

‘‘जब स्थानीय सरकारें यह महसूस करती हैं कि राजस्व विभागों का अच्छा

प्रशासन भारत सरकार को ही नहीं बल्कि उन्हें भी अधिक आय और उनके मन

मुताबिक बदलाव लाने के साधन उपलब्ध कराता है तभी प्रत्येक का मन पसंद

अच्छा प्रशासन स्थापित किया जा सकता था।’’

अतः प्रांतीय सेवाओं की बढ़ती आय का यह साक्ष्य एक ऐसा सुखद आश्चर्य था जो सर जान स्ट्रेची के विचारों की पुष्टि करता था। इसीलिए प्रांतों को दी जाने वाली पूर्तियों के माध्यम के रूप में नियतन राजस्व के स्थान पर निर्दिष्ट राजस्व व्यवस्था अपनाने के पीछे सर जान स्ट्रेची के दो उद्देश्य थेµ एक, प्रांतों के राजस्व की बढ़ोतरी और दूसरा प्रांतीय वित्त में लचीलापन पैदा करना।

सर जान स्ट्रेची द्वारा अपनाई गई योजना न तो नई थी और न ही पहली बार सामने लाई गई थी। यह योजना उन लोगों के दिमाग में भी थी जिन्होंने 1870 में प्रांतीय वित्त पर विचार-विमर्श में भागीदारी की थी। वास्तव में सर जान स्ट्रेची ने इस योजना की पैरवी 1872 में कर दी थी। ख्1, 1870 में भारत सरकार ने योजना का पक्ष इसलिए नहीं लिया क्योंकि उसे डर था कि कहीं वह राजस्व के स्रोतों को हमेशा के लिए खो न दे जबकि उन स्रोतों के विकास पर ही सरकार का स्थायित्व टिका हुआ था। हालांकि तब तक भारत सरकार की वित्तीय स्थिति कुछ सुधर चुकी थी और प्रांतीय प्रबंधन का छः वर्षों का प्रयोग भी योजना के बारे में उन लोगों में भी विश्वास भर चुका था जिन्होंने कभी भी योजना की प्रशासकीय उपयोगिता को पूर्ण रूप से स्वीकारा नहीं था। प्रांतीय सरकारों के स्रोतों में बढ़ी उत्पादकता और खर्चों में कटौती का माध्यम बन जाने की संभावना इस योजना में जुड़ गई थी। इन सभी कारणों के दबाव ने मिलकर प्रांतीय वित्त के विकास में एक नए चरण की रचना की जिसे, पूर्ति के विशिष्ट तरीके अपनाने से, निर्दिष्ट राजस्व द्वारा बजट का चरण कहा जा सकता है।

वास्तव में नियतन अभी भी नई व्यवस्था का हिस्सा बने रहे, लेकिन ऐसा उन राजस्व के नियतन की दिक्कत को लेकर था जिनकी आय शामिल किए गए खर्चों के बराबर ही होती। किन्हीं भी परिस्थितियों में कुछ न कुछ अंतर तो होना ही था।

  1. दिनांक 27 जुलाई, 1872 के उनके सारांश देखें।