142 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अतः प्रदत्त राजस्व से होने वाली सामान्य अनुमानित प्राप्तियां जरूरतों से कम रहीं और प्रत्येक प्रांत के संदर्भ में अंतर को नियतन के समायोजन से पूरा करना पड़ा।
विभिन्न प्रांतों के लिए नियतन के समायोजन को निर्धारित करने का तरीका थोड़ा बहुत जटिल था और इसलिए विकास के दूसरे चरण के तहत विभिन्न प्रांतों के प्रांतीय बजटों की संरचना की जांच करने से पहले उसे आसानी से समझाया जा सकता है।
यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि (1) प्रांतों के कुल संसाधनों की (नियमित सेवाओं से होने वाली आय), (2) निर्दिष्ट राजस्व से हुई आय, और (3) नियतन के समायोजन की प्रणाली के अंतर्गत पूरा किया गया व्यय प्रांत विशेष के लिए समंजनकारी नियतन तय करना सही आंकड़ों को बैठाने का सवाल था। समंजनकारी नियतन की एक निश्चित संख्या तय करने के पहले जरूरी था कि निगमित सेवाओं से प्राप्त सामान्य आय और खर्च हुई राशि का लेखा-जोखा करना टेढ़ी खीर था। मोटे तौर पर भारत सरकार ने कुछ वर्षों के आधार पर प्रत्येक वर्ष की औसत आय को सामान्य आय मानते हुए उसे ही नियतन के आकलन का आधार बनाया। इसी प्रकार पिछले वर्षों में राजस्व के सालाना विकास को आधार बनाकर प्रत्येक स्रोत के बढ़ने की एक विशेष सामान्य दर मान ली गई ताकि मानी गई वार्षिक बढ़ोतरी की सामान्य दर पर प्रत्येक आने वाले वर्षों की सामान्य आय पिछले वर्षों की सामान्य आय से बढ़ती गई और जैसे-जैसे मानी गई सामान्य विकास की दर पर निर्दिष्ट राजस्व की सामान्य मात्रा बढ़ती गई वैसे-वैसे उसी अनुपात में अगले वर्षों के नियतन घटते गए। निर्दिष्ट राजस्व के लिए मानी गई इस सामान्य विकास दर की अवधारणा कभी-कभी उनकी पिछली उत्पादकता द्वारा अन्यायपूर्ण साबित होती रही। चूंकि सभी स्थितियों में बढ़ोतरी की ऊंची दर का मतलब नियतन के ”ास से था, अतः प्रांतों ने इसके विस्तार पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। प्रांतों को संतुष्ट करने और अनुमान की गलतियों की भरपाई करने की गरज से भारत सरकार ने कपट रहित छूट दे डाली। उसने सहमति जताई कि यदि वास्तविक परिणाम अनुमानित सामान्य आय से भिन्न रहे, या कम अधिक रहे तो उन्हें साम्राज्यवादी और प्रांतीय सरकारों के बीच बराबर-बराबर बांट दिया जाएगा। यदि वास्तविक आय सामान्य से अधिक हो तो वर्ष के लिए साम्राज्यवादी सरकार से तय समंजनकारी नियतन जितनी राशि बढ़े उसे घटा दिया जाएगा और यदि यह सामान्य से कम रही तो नियतन में जितना घाटा हुआ है उसे बढ़ा कर पूरा कर दिया जाएगा।
इस अत्यंत नाजुक तरीके को अपनाने का मुख्य उद्देश्य भारत सरकार को फायदे की उस स्थिति में पहुंचाना था जहां से वह किसी भी पक्ष के लिए अनचाही परेशानी