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निर्दिष्ट राजस्व बजट

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पैदा किए बगैर नियतन का समायोजन कर सके। लेकिन इसके पीछे एक अन्य फायदा भी था जिसे भले ही उस समय नहीं समझा गया लेकिन जो काफी प्रभावशाली था। प्रांतों से सामान्य अनुमान से संभावित घाटे को आधा बांटने की सहमति लेकर अलग हुए राजस्व का मितव्ययी और न्यायसंगत प्रशासन द्वारा प्रबंधन की गारंटी ले ली गई। यदि भारत सरकार अनुमानित आय से नीचे के घाटे को पूरी तरह से स्वयं ही वहन करने पर राजी हो जाती है तो यह कहना मुश्किल होगा कि प्रांतीय सरकारें अपनी आय को सामान्य स्तर पर लाने के लिए अपने स्रोतों के विकास के लिए आवश्यक प्रयास करेगी लेकिन उनके इस भय ने आधे घाटे को सहने की उनकी मजबूरी वहीं व्यापक रूप न ले ले, राजस्व में तेज गिरावट से जिसकी पूरी संभावना थी उन्हें अधिक सचेत रहने के लिए मजबूर कर दिया। इस तरह जबकि ढिलाई पर प्रभावी नियंत्रण लग चुका था योजना क्रियाशीलता को बढ़ावा देने में भी पीछे नहीं थी। सामान्य से ऊपर की आय का आधा मिलने की गुंजाइश ने प्रांतों को अपने स्रोतों को सामान्य से अधिक बढ़ाने को प्रेरित किया। यदि साम्राज्यवादी सरकार उनकी अधिक आमदनी को पूरा ले लेती तो शायद वे ऐसा करने के लिए प्रेरित नहीं होते। संक्षेप में, घाटे को सहने का कठोर असर और लाभ कमाने के उत्साहवर्द्धक प्रभाव ने मिल कर प्रांतीय वित्त व्यवस्था को खर्चे में मितव्ययता और स्रोतों की उत्पादकता की दृष्टि से उतना पूर्ण बना दिया जितना बनाया जा सकता था।

प्रांतीय वित्त में इस नए कदम की अवधारणा और कार्यान्वयन के पीछे के कारणों और इसकी विशेषता के गुणों की चर्चा कर लेने के पश्चात् हम अब प्रांतीय बजटों की संरचना और उनमें शामिल किए गए राजस्व तथा खर्चों का अध्ययन करने की दिशा में बढ़ सकते हैं। दुर्भाग्य से पूर्ण रूप से प्रांतीय बजटों का खुला दृश्य पेश करना संभव नहीं है। क्योंकि खर्चे के मद सभी प्रांतीय बजटों में एक ही रूप में शामिल नहीं किए गए थे। प्रत्येक प्रांत को व्यक्तिगत रूप में लिया गया था। यह हमें मजबूर करता है कि 1877-78 में विभिन्न प्रांतों के लिए पुनर्गठित अलग-अलग प्रांतीय बजट का विवेचन करें।

उत्तर पश्चिमी प्रांत और अवध ख्1,

कुछ अन्य प्रांतों की तरह इस प्रांत का बजट भी पहले से शामिल मदों में अतिरिक्त मद जोड़ कर पुनः तैयार किया गया था न इसका विस्तार नए रूप में प्रांत के बजट में खर्चे और आय के निम्न मद शामिल किए गए थेःµ

  1. वित्तीय विभाग की अधिसूचना सं. 1807, भारत का गजट, भाग-1, 31 मार्च, 1877, पृ. 172