162 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
एक बार जब असम और बर्मा के बारे में सांझा राजस्व का नया सिद्धांत लागू कर दिया गया तो भारत सरकार के लिए यह संभव नहीं था कि इसे अन्य प्रांतों में लागू होने से रोक सके। कई प्रांतों के सन् 1877 में जो बंदोबस्त हुए उसमें कई त्रुटियां ही नहीं थीं, वरन् वह गैर बराबरी की समयावधि से भी ग्रसित थे। सिर्फ बंबई और बंगाल का सन् 1877-78 में संपन्न बंदोबस्त 5 वर्ष की अवधि का था। मध्य प्रांत और पंजाब का तीन वर्ष के लिए किया गया था, जबकि उत्तर-पश्चिम प्रांत का मात्र दो वर्ष की अवधि के लिए सन् 1877-78 में सम्पन्न हुआ। इससे यह स्पष्ट होता है कि बर्मा और असम के बन्दोबस्त की अवधि पूरी होने तक अन्य प्रांतों के बंदोबस्त शीघ्र ही समाप्त हो गए और सांझा राजस्व के सिद्धान्त पर उनकी पुनर्रचना की आवश्यकता महसूस हुई। भारत सरकार ने जबकि प्रक्रिया में ढील अपनाई और ऐसा करके अपनी निपुणता का परिचय दिया क्योंकि शीघ्र ही एक नये सांझे राजस्व और व्यय के सिद्धान्त को अपनाना पड़ा जिसे सब पर लागू करना था। यह सब परीक्षण काल था और चतुराई के अतिरिक्त और कुछ नहीं था। दूसरे, प्रांतीय बजट की एकपक्षीय त्रुटियां ज्ञात हो चुकी थी। इस प्रकार भारत सरकार को समझ आ गई कि कई प्रांतों के बजट एक पूर्णाकार के यानी साम्राज्यवादी बजट के अंशमात्र हैं। यह जाहिर तौर पर सलाह योग्य था कि प्रांतीय बजट को स्वतंत्र रूप में एक दूसरे के दावों, आवश्यकताओं और प्राथमिकताओं से भिन्न बनाया जाय। लेकिन इस प्रकार एक बात के तुलनात्मक एवं समझौते पूर्ण दावों के क्रियन्वयन को दूसरे की आवश्यकताओं के प्रकाश में देखते हुए विभिन्न प्रांतों को भी उसी समदृष्टि से देखना आवश्यक था ताकि इसका वांछित प्रभाव स्पष्ट हो, और यह भी जरूरी था कि सभी प्रांतों के बजट का निपटारा एक साथ ही हो। बर्मा और असम के अनुभवों से लाभ उठाने की इच्छा और इस पर विचार करने की महत्ता ने भारत सरकार को बाध्य किया कि प्रांतीय सरकारों की सहमति से, जैसा भी मामला हो, प्रांतों से संबंधित वित्तीय करार की अवधि या तो बढ़ाई जाय अथवा घटाई जाय, ताकि सबकी 31 मार्च, 1882 तक समकालिक समाप्ति संभव हो सके।
1882-83 का वित्तीय बंदोबस्त
बर्मा के विषय में सन् 1878 से लागू सिद्धान्त को बढ़ाकर सन् 1882-83 से सभी प्रांतों के साथ नये बंदोबस्त किए गए। राजस्व और व्यय के कुछ विशेष शीर्ष, जहां तक संभव था कम से कम, पूर्णरूपेण अथवा सूक्ष्मतम स्थानीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए, साम्राज्यवादी शीर्ष में वर्गीकृत किए गए। दूसरों को पूर्णतया