सांझा राजस्व बजट
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प्रांतीय वर्गीकृत किया गया था। जो शेष थे उन्हें एक बीच की सूची में रखा गया जिसे संयुक्त कहा गया और जिनमें अधिकतर साम्राज्यवादी और प्रांतीय सरकारों की बराबर की सांझेदारी थी। उन मामलों में जहां प्रांतीय व्यय संसाधनों से अधिक हो जाता था, उस राजस्व से जो प्रांतीय था और साथ ही साथ सांझे में था, उसका शेष बजाय साम्राज्यवादी खजाने के निश्चित आबंटन में से देने से हर प्रांत के भू-राजस्व के निश्चित प्रतिशत के साथ ठीक कर दिया गया था जो कि पूर्णतया राजस्व का एक साम्राज्यवादी शीर्ष था, सिर्फ बर्मा के मामले को छोड़कर जहां पर साम्राज्यवादी चावल निर्यात शुल्क और साथ ही नमक राजस्व का प्रतिशत बढ़ा दिया गया था।
सन् 1882 में प्रांतीय वित्त योजना के विस्तार के साथ-साथ भारत सरकार भी इच्छुक थी कि राजस्व और व्यय के विभिन्न शीर्ष जो अब तक तीन श्रेणियों में विभाजित थे उनमें सरलता और एकरूपता लाई जाय। यह स्मरण रखना होगा कि सन् 1877 से प्रभावी करार असमानता और जटिलता ग्रस्त थे। एक से व्यय सभी प्रांतों में प्रांतीयकृत नहीं किए गए थे। पुनः खर्चे को बांटने के लिए अनुदान राशि को विभाजित करना पड़ता था ताकि एक हिस्सा प्रांतीय और एक भाग साम्राज्यवादी भाग के रूप में संरक्षित रखना पड़ता था। निर्दिष्ट राजस्व के मामले में यह गणना व्यवस्था कम जटिल नहीं थी। लेकिन जब 1882 का बंदोबस्त हुआ उन त्रुटियों को दूर कर दिया गया, और यहां यह बताना आवश्यक है कि राजस्व और व्यय के शीर्षों को प्रांतीय बना दिया गया जो कि साम्राज्यवादी थे और किसको किस सीमा तक विभाजित किया गया वह निम्न प्रयास में दृष्टव्य हैःµ
राजस्व
साम्राज्यवादी प्रांतीय
(1) (2) (3)
i. भू राजस्व सम्पूर्ण, सिर्फ उसे बर्मा में मत्स्य पालन, उत्तर पश्चिम
छोड़कर जो प्रांत के प्रांत और अवध में तराई, भावर और
खाने में दर्ज हैं दूधी की रियासतों से उगाही, जलमिलों
और खदानों से किराया, बंबई में
पुनर्ग्रहीत सेवा भूमि और सेवा
परिवर्तन विषयक किराया, सभी
प्रांतो में एक निश्चित प्रतिशत
साम्राज्यवादी भू-राजस्व पर जिससे
प्रांतीय राजस्सव और प्रांतीय व्यय
के मध्य अंतर को ठीक किया जा
सके।