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सांझा राजस्व बजट

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पर व्यय हेतु थे, और अवशेष 316,000 पौंड स्थानीय करों के भुगतान हेतु प्रदान किए। इन आर्थिक उदारता (उपहारों) के साथ ही साथ भारत सरकार ने एक अच्छी शुरुआत के लिए बंगाल को 285,000 पौंड, बर्मा को 20,000 पौंड, उत्तर पश्चिम प्रांत को 55,000 पौंड और दिए ताकि वे वर्ष 1881-82 की समाप्ति से पहले अपने संतुलन में वृद्धि कर लें। इस आर्थिक उपहार ने जो एक वर्ष में 496,000 पौंड बैठता था, और जिससे 470,000 पौंड के वार्षिक लाभ की संभावना थी, उसने साम्राज्यवादी

खजाने को 26,000 पौड के वार्षिक नुकसान में बदल दिया। ख्1,

इस संबंध में यह भी स्मरणीय है कि भारत सरकार ने प्रांतीय सरकारों को प्रतिपूर्ति में वह राशि उदारतापूर्ण दान के रूप में वापिस कर दी जो वर्ष 1879-80 और 1880-81 में करों के रूप में लगाई थी। लेकिन सन् 1882 के संशोधन के थोड़े अर्से के बाद ही भारत सरकार ने जो उदारतापूर्ण नीति अपनाई थी उसे धक्का लगा और प्रांतीय सरकार के भुगतान शेष पर जो सन् 1886-87 में दिखाई दिया, जबरी ऋण लगाने के लिए बाध्य होना पड़ा। उस साल का वित्तीय लेखा प्रस्तुत करते हुए भारत सरकार के वित्त सदस्य ने कहा थाःµ

‘‘22 जब 1885-86 के अनुमान प्रस्तुत किए गए... भारतीय प्रशासन और वित्त

एक नये दौर में प्रविष्ट हो चुके थे। सन् 1882 से देश ने जो थोड़ी सी अवधि

में सुख भोगा है वह समाप्त हो चुका है। ...गत वर्षों में मध्य एशिया में जो

घटनाएं घटित हुई हैं उसमें भारत स्वयं को यूरोपीय शक्तियों में से एक की

निकटता अनुभव करता है। इसलिए वह अपनी सैन्य शक्ति की जो बढ़ती हुई

आवश्यकता है उससे स्वयं को अलग नहीं कर सकता। जो घटनाएं घटित हो

चुकी हैं वे निश्चय ही बदल चुकी हैं और जैसाकि ज्ञात था, उन्हें बदलना भी

चाहिए था, हमारे अनुमानों का स्वरूप आंतरिक प्रगति के शांतिमय रास्ते पर

तेजी से बढ़ने की ओर प्रेरित करता है जिसकी कि हमने कामना की थी कि

हमें अबाधित छोड़ दिया।’’

भारत सरकार द्वारा दूसरी बार प्रांतीय संसाधनों को जुटाने के लिए जो अन्य रास्ते अख्तियार किए गए और उनके संतुलन से विनियोग के जरिए 400,000 पौंड की राशि वर्ष 1886-87 में इकट्ठी की गई, निम्न तालिका में इस काल की प्रांतीय वित्त दशा संक्षेपित की जा रही हैःµ

प्रांत वार्षिक लाभ और घाटा

  1. वित्तीय लेखा, 1882-83, पृष्ठ 15