170 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
1882-83 1883-84 1884-85 1885-86 1886-87
पौंड पौंड पौंड पौंड पौंड सी. पी 33,775 76,212 18,047 22,080 115,656 (सेन्ट्रल
प्रोविंसेज)
बर्मा 171,207 -90,030 -89,725 * $ 71,743$$ असम 13,887 5,216 -40,577 26,299 28,576 बंगाल 539,611 146,027 48,910 26,777 52,911 उत्तर पश्चिम 281,222 357,630 -69,276 -180,060 -12,408 प्रांत और अवध
पंजाब -110,966 -15,765 -41,545 42,447 3,106 मद्रास 108,421 10,820 -87,284 146,692 -78,689 बंबई -149,894 -2,585 6,006 291,976 -161,369
* वर्ष के अंत में कोई अधिशेष नहीं था।
$ संतुलन
$$ उस वर्ष के चालू व्यय के ऊपर चालू राजस्व के आधिक्य से प्राप्त अधिशेष। भारत सरकार
के वार्षिक वित्त और राजस्व लेखे से संकलित।
सन् 1882-83 में प्रांतीय सरकारों के साथ जो बंदोबस्त किए गए वे सिर्फ पिछले बंदोबस्त में साम्राज्यवादी राजस्व में निश्चित सांझा आबंटन में परिवर्तन के मामले में न केवल भिन्न थे, वरन् वे एक अन्य महत्त्वपूर्ण मामले में भी भिन्न थे और वह था उनकी समयावधि। यद्यपि प्रांतीय वित्त योजना के परिणामों को जो 1871-77 की अवधि के हैं एक तालिका में दर्शाया गया है, लेकिन यह नहीं समझ लेना चाहिए कि विभिन्न प्रांतों के साथ जो बंदोबस्त किए गए थे वह छः वर्ष की अवधि के लिए ही थे। दूसरी ओर, बंदोबस्त केवल वार्षिक आधार पर किए गए थे जोकि लगातार नवीनीकरण की प्रक्रिया द्वारा सन् 1877 तक चलते रहे। जो सम्मिलित नतीजे थे वे जारी रहने वाले काल के लिए थे इसलिए नहीं कि बंदोबस्त उस समय में किए गए थे, लेकिन इसलिए कि जिस सिद्धांत पर वे आधारित थे वह उसी काल के लिए था। सन् 1877 के पश्चात् जो बंदोबस्त किए गए वे निसंदेह लंबी अवधि के लिए हुए थे। दो मामलों में वे 5 वर्ष के लिए थे, शेष के लिए समय-सीमा दो से तीन वर्ष की थी। अल्प समय की अवधि का सिद्धान्त जैसे कि निश्चित आबंटन सिद्धान्त, साम्राज्यवादी कोष के लिए बड़े फायदे का था। यह स्मरणीय है कि, इस बंदोबस्त का उद्देश्य प्रथमतः प्रांतीय सरकारों की मांगों पर एक निश्चित सीमारेखा तय करना था, क्योंकि साम्राज्यवादी सरकार के स्रोत पहले ही बहुत कम थे। सच्चाई तो यह