सांझा राजस्व बजट
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जिम्मेदार थी। लेकिन प्रांतों को सेवाओं के वित्तीय प्रबंध की जो स्वतंत्रता प्राप्त थी, जो उनके विशेष नियंत्रण में थी और प्रांतों की आम जनता की आवश्यक उपयोगी सेवाओं के संवर्धन की संभावनाओं के लिए भी थी, दूसरों की अनदेखी करके जिसकी कि उपयोगिता यद्यपि प्रांतों के लिए दूर की चीज थी, समग्र रूप में देश के लिए वास्तविक नहीं थी। राष्ट्रीय महत्त्व की सेवाओं जैसे शिक्षा, सफाई, पुलिस की विशेषतया प्लेग और अकाल जैसी अवधि के दौरान उपेक्षा नहीं की जा सकती थी।
लेकिन भारत सरकार इन सेवाओं के लिए निर्धारित प्रांतीय कोष का विभाजन नहीं कर पाई, क्योंकि प्रांतीय वित्त की शर्तों में से एक यह भी शर्त थी कि प्रांतीय सेवाओं पर व्यय करने की उन्हें स्वतंत्रता हो, जिनका कि वर्गीकरण अनिवार्य और ऐच्छिक किसी भी श्रेणी में नहीं किया गया था, जैसा कि स्थानीय वित्त के विषय में महाद्वीपीय सिद्धांत था।
वास्तव में भारत सरकार इतनी शक्तिहीन नहीं थी जितनी कि इंग्लैंड की केन्द्रीय सत्ता, जैसा कि भली प्रकार मशहूर है वह स्थानीय शासन द्वारा उपेक्षित मामलों को संशोधित नहीं कर सकती, जब तक कि परमाधिदेश जारी न हो। लेकिन एक अडि़यल प्रांत को सही रास्ते पर लाना वैसे बहुत आसान बात थी लेकिन सुखद कतई नहीं थी। ऐसी स्थिति को सुधारने के लिए प्रांतीय वित्त की क्रियाशीलता को स्थगित कर देना काफी था। ऐसी गंभीर कार्यवाही करने के बजाय भारत सरकार ने खुशी से विशेष सेवाओं के लिए अनुदान की धनराशि में कटौती कर दी जो कि प्रांत द्वारा लापरवाही बरतने की दशा में एक सशक्त और परखी ख्1, हुई सुधारात्मक कार्यवाही थी और जो उन सेवाओं को राष्ट्रीय न्यूनतम आदर्श के रूप में रखने के लिए आवश्यक था और जिसे निश्चय ही लाभप्रद की जगह कष्टकारी माना गया। ख्2,
विकेन्द्रीकरण अधःपतन को विघटन में घसीटे इसे रोकने में सहायता अनुदान के गुण से अभिभूत आयोग ने सिर्फ यह सिफारिश की कि प्रांतीय वित्त को अधिक लोच प्रदान करने के प्रयत्न करने चाहिए जो कि आवंटन के कम से कम संभव विस्तार को घटाने से संभाव्य थे।
आयोग की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए भारत सरकार ने यह निश्चय किया कि राजस्व और व्यय के वर्तमान आबंटन में कुछ संशोधन किए जाएं और 1912 से अर्द्धस्थाई बंदोबस्त को स्थाई बंदोबस्त में बदल दिया जाए। स्थाई बंदोबस्त अर्द्धस्थाई बंदोबस्त से भिन्न नहीं था, जिसे कि प्रतिस्थापित किया गया लेकिन जहां तक आबंटन के सिद्धांत का प्रश्न है इससे कोई विशेष प्राप्ति संभव नहीं थी। उस विषय में उनमें सिर्फ भिन्नता का एक निश्चित समंजक आबंटन का
संभवतः यह प्रणाली इंग्लैंड से ली गई हो।
एस. बैब, ग्राण्टस इन एड, 1911, पृ. 25