सांझा राजस्व बजट
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थी जितनी पांच वर्षों की होती है। इसलिए स्थाई बंदोबस्त के जो गुण थे यह उनमें विमुख नहीं होता जो इसने पांच वर्षीय बंदोबस्त के अवगुणों को जाहिर किया। स्थाई बंदोबस्त की जो अवधि थी वह समय प्रथम विश्व युद्ध का था, और अर्द्ध सामान्य घटनाओं ने प्रांतीय वित्त पर बहुत कुप्रभाव डाला। यदि स्थाई बंदोबस्त दीर्घावधि के लिए हुए होते तो परिस्थितियां भिन्न होतीं और सब कुछ सुलझ जाता। जो हमारा विचारणीय विषय नहीं है। क्योंकि अप्रैल 1921 से ब्रिटिश भारत में प्रांतीय वित्त ने एक नये दौर में प्रवेश किया। इस दौर पर अगले भाग में प्रकाश डाला जाएगा। यहां अध्ययन का विषय जो समाप्त हो रहा है पुराने दौर में प्रांतीय वित्त के विकास को देखना है जैसा कि वह चरणबद्ध रूप में विकसित हुआ। लेकिन यह अध्ययन अधूरा ही रहेगा जब तक कि हम पुराने दौर और प्रांतीय सरकारों के वित्त की परस्पर संबंधित कार्य रचना को नहीं देखते। लेकिन आरंभ करने से पहले यह न सिर्फ दिलचस्प और महत्त्व की होगी कि प्रांतीय वित्त के विकास का यह अध्ययन अंतिम अवस्था में प्रांतीय राजस्व और व्यय का निम्न प्रकार सिंहावलोकन भी प्रस्तुत करता है जो यह दर्शाता है कि भले ही यह छोटी शुरुआत हो यह प्रांतीय वित्त की बड़ी प्रगति और विस्तृत आयामों तक पहुंच सका, अर्द्धशताब्दी के दौरान जिसके अन्तर्गत उसने अपनी यात्रा तय की।