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ईस्ट इंडिया कंपनी के ऐतिहासिक विकास में न जाते हुए इसकी प्रशासन व्यवस्था का सुविधापूर्वक इस प्रकार विवेचन किया जा सकता हैः
I. स्वामी मंडल (कोर्ट)
‘‘ईस्ट इंडिया कंपनी के शेयरधारी एक निश्चित संख्या में इसके सदस्य होते थे, जो परस्पर अपनी संस्था में से गुप्त मतदान द्वारा निश्चित (चौबीस) प्रतिनिधियों का चुनाव करते थे। जिन्हें स्वामित्व भरोसेमंद मानता था और योजना निर्धारण और भारत तथा इंग्लैंड के हितों के अनुकूल हर संभव कार्यवाही करने का जिनको उत्तरदायित्व सौंपा गया था, और स्वयं के लिए प्रत्यायोजित प्राधिकार की कार्यवाही पर सीमित निगरानी तथा नियंत्रण सुरक्षित रख लिया था।’’
इस कोर्ट में स्थान प्राप्त करने तथा मतदान करने की पात्रता इस प्रकार थीः
- 500 पौंड स्टाक का मालिक इस कोर्ट में स्थान ग्रहण करने का पात्र था।
- 1,000 पौंड स्टाक का मालिक एक मत डालने का पात्र था।
- 3,000 पौंड स्टाक का मालिक दो मत डालने का पात्र था।
- 6,000 पौंड स्टाक का मालिक तीन मत डालने का पात्र था।
- 10,000 से 1,00,000 तथा अधिक पौंड की राशि के स्टाक का मालिक चार
मत डालने का पात्र था।
इसके साथ-साथ, कम से कम एक वर्ष के लिए मतदान पूर्व स्टाक अधिकार में रखा गया हो। प्रतिनिधित्व मतदान की कोई व्यवस्था नहीं थी और अल्पवयस्क मतदान के पात्र नहीं थे। सम्राट और कंपनी दोनों पक्ष के मतदाताओं में लार्ड, कॉमनर्स, महिलाएं, पादरी और असैनिक एवं सैन्य अधिकारी होते थे।
कोर्ट के अधिवेशन त्रैमासिक µ मार्च, जून, सितम्बर और दिसम्बर में होते थे। कोर्ट का विशेष अधिवेशन बुलाने के लिए नौ सक्षम स्वामी पर्याप्त थे। स्पीकर पदेन अध्यक्ष होता था जो अधिवेशन की अध्यक्षता करता था। कोर्ट की स्वीकृति हेतु सभी प्रस्ताव करता था और सदस्यों के समक्ष कंपनी के लेन-देन का विवरण रखता था।