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प्रांतीय वित्तव्यवस्था की सीमाएं
प्रांतीय सरकारों के अस्तित्व में होने परन्तु उनके पास आवश्यक प्रांतीय वित्त न होनाµप्रशासन के इतिहास में एक अपूर्ण असंगति के बारे में जिन व्यक्तियों से जानकारी होने की आशा की जाती है, उनके लिए यह अध्ययन काफी रुचिकर होगा कि 1833 में जो असंगति पैदा हुई उसे 1870 में कैसे ठीक किया गया या ठीक किये जाने का आभास हुआ। ख्1,
- तथापि यह धारणा व्याप्त है कि 1870 से काफी पहले प्रांतीय वित्तव्यवस्था विद्यमान थी, लेकिन निस्
संदेह यह एक भूल है, जिसे 1870 से पूर्व वित्तीय विकेन्द्रीकरण के इतिहास को संक्षेप में याद
करके यहां सुधारा जा सकता है। भारतीय वित्तव्यवस्था के विकेन्द्रीकरण के इतिहास में 1855 का
वर्ष सदैव महत्त्वपूर्ण रहेगा। इसी वर्ष में ही स्थानीय वित्तव्यवस्था का उद्गम हुआ, तथापि यह नहीं
मान लिया जाना चाहिए कि 1855 से पूर्व कोई स्थानीय राजस्व प्रणाली नहीं थी। इसके प्रतिकूल
बहुत छोटी-छोटी निधियां विद्यमान थीं, जैसे नौकाघाट निधि, पथकर निधि, उपकर, आदि और इन्हें
स्थानीय जनोपयोगी सेवाओं पर खर्च किया जाता था, लेकिन ध्यान देने योग्य महत्त्वपूर्ण बात यह है
कि ऐसी निधियों से जो राशि बच जाती थी उसे अलग खाते में नहीं रखा जाता था, अपितु साधारण्
ातया उसे देश के सामान्य अधिशेष में मिला दिया जाता था। संभवतः बंगाल तथा उत्तर-पश्चिमी प्रांत
इसका अपवाद थे क्योंकि ऐसा लगता है कि वहां ऐसी अधिशेष राशि पृथक स्थानीय निधि लेखाओं में
रखी जाती थी (देखिये कलकत्ता रिव्यू, 1851, खंड 16, पृष्ठ 464-466)। 11 मई, 1855 के वित्तीय
संकल्प के द्वारा ही स्थानीय निधियों को पूर्णतया साम्राज्यिक निधियों से अलग किया गया और उन्हें
‘जमा राशियां’ µ ‘ऋण’ लेखा शीर्ष का एक उप-विभाजन माना गया (देखियेµएकाउंटेंट मैन्युअल,
लेखक वाई. वेंकटरामैया, भाग 1, मद्रास, 1866, पृष्ठ 79) और सितम्बर, 1863 के संकल्प के द्वारा
प्रत्येक प्रांत के लिए साम्राज्यिक बजट से अलग एक निश्चित स्थानीय निधि बजट की स्थापना करके
स्थानीय वित्त की व्यवस्था की गई। ऐसा हुआ कि स्थानीय प्राधिकारियों के अभाव में भारत सरकार ने
स्थानीय निधि बजट तैयार करने और उसका निष्पादन करने का काम सम्बंधित प्रांतीय सरकारों को