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206 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

इस मामले पर सही अर्थों में विचार करने पर यह मान लेना स्वाभाविक ही था कि ब्रिटिश भारत में इस प्रकार स्थापित प्रांतीय वित्त प्रणाली संगठन की दृष्टि से स्वतंत्र थी। वास्तव में ऐसे दृढ़ विश्वास व आस्था के बिना इसके उद्गम और विकास के अध्ययन का आधार बनना कठिन है, किन्तु यदि प्रांतीय वित्त व्यवस्था संगठन की दृष्टि में स्वतंत्र थी तो प्रांतों के पास ऐसी वित्तीय शक्तियां होनी चाहिए जो प्रायः स्वतंत्र राज्यों के पास होती हैं। यह जानने के लिए कि क्या प्रांतीय वित्त व्यवस्था स्वतंत्र वित्त व्यवस्था थी या नहीं, हम बजट बनाने की स्वतंत्रता तथा इससे संबंधित अन्य बातों को इन शक्तियों के विद्यमान होने का प्रमाण मान सकते हैं। स्वतंत्र रूप से बजट बनाने की शक्ति में ऐसी सेवाएं, जिनका देश की आवश्यकताओं के

सौंपा, क्योंकि स्थानीय आवश्यकताओं के बारे में उन्हें अधिक जानकारी थी। इस अप्रत्याशित घटना

के कारण बहुत से लोग भ्रम से इसे अनिवार्य रूप से प्रांतीय वित्तव्यवस्था मान लेते हैं। लेकिन यह

एक बहुत बड़ी भूल है। 1870 से पूर्व केवल स्थानीय वित्त व्यवस्था ही विद्यमान थी, यद्यपि इसका

संचालन प्रांतीय सरकार करती थी जिसके हाथ में स्थानीय निधि एक न्यास के रूप में होती थी। चूंकि

प्रांतीय सरकारें स्थानीय निधियों संबंधी आय और व्यय का ब्यौरा पूरे प्रांत के एक स्थानीय निधि

लेखा में रखती थी, इसका अर्थ यह नहीं लगाया जा सकता कि वे अपनी इच्छा से इस धनराशि का

प्रयोग कर सकती थीं µ यदि ऐसा होता तो इसे प्रांतीय वित्त व्यवस्था की संज्ञा दी जा सकती थी।

यूनाइटेड किंगडम में उद्गृहीत स्थानीय करों का वित्त मंत्री (चांसलर ऑफ दि एक्सचैकर) के बजट में

समावेश करने के अतिरिक्त की गई कार्यवाही से इसकी वित्तीय स्थिति के बारे में संकेत मिल सकता

है। स्थानीय निधियों पर प्रांतीय सरकारों का अधिकार नहीं था क्योंकि उन्हें केवल उन्हीं प्रयोजनों के

लिए खर्च किया जा सकता था जिनके लिए वे दी जाती थीं। इस अर्थ में वह स्थानीय निधि थी न

कि प्रांतीय निधि। कुछ लोग गलती से इसे प्रांतीय वित्त संभवतः इसलिए समझते हैं क्योंकि ‘स्थानीय

सरकार’ शब्द का प्रयोग ‘प्रांतीय सरकार’ के पर्याय के रूप में किया जाता है। लेकिन जहां स्थानीय

सरकार और प्रांतीय सरकार शब्दों का प्रयोग एक-दूसरे के स्थान पर किया जा सकता है, याद रहे

वहां स्थानीय और प्रांतीय वित्त का इस प्रकार प्रयोग नहीं किया जा सकता। वास्तव में भारत में वित्तीय

संगठन के इतिहास में ऐसा भी समय आया जब स्थानीय वित्तव्यवस्था तो विद्यमान थी लेकिन सही

अर्थों में स्थानीय सरकार और प्रांतीय वित्तव्यवस्था विद्यमान नहीं थी जबकि प्रांतीय सरकारें विद्यमान

थीं। यह संभव है कि जब तक प्रांतीय सरकार को स्थानीय सरकार पुकारने की आदत बनी रहेगी तब

तक यह भ्रांति पूरी तरह खत्म नहीं होगी। जबकि कुछ लोगों ने इस बात पर बल दिया है कि प्रांतीय

वित्त व्यवस्था 1870 से काफी पूर्व विद्यमान थी, 14 सितम्बर 1870 के संकल्प को जिसके अंतर्गत

प्रांतीय वित्त व्यवस्था की योजना आरंभ की गई, ‘स्थानीय वित्त व्यवस्था संबंधी संकल्प’ पुकारा जाता

है मानों इससे स्थानीय नहीं बल्कि प्रांतीय वित्त का उद्भव हुआ हो। सही शब्दावली का प्रयोग कर

ऐसी असंगतियों से बचा जा सकता है।