228 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
राज्यों के पृथक संसाधन हैं जो कानूनी तौर पर उनके अपने हैं और इसलिए अपनी सेवाओं के लिए भुगतान करने के पश्चात् वे केन्द्रीय सरकार को अंशदान करते हैं तो कह सकते हैं कि उन्होंने अपने राजस्व को त्याग दिया। लेकिन प्रांतीय सरकारों के मामले में यह कहना असंगत है। भारत में प्रांतीय सरकारें निर्णायक होने के बजाय प्रशासनिक राज्यतंत्रों में सबसे कमजोर राज्यतंत्र हैं। 1833 तक प्रांतों के पास पृथक अधिकार थे जिससे वे समर्पित करने की स्थिति में थे। उस समय भारत सरकार को संघीय आधार पर संगठित किया गया होता तो प्रांतों की स्थिति काफी हद तक वही होती हो संघीय देशों में राज्यों की है। लेकिन 1833 के अधिनियम द्वारा साम्राज्यिक व्यवस्था की स्थापना से भारत में संघ बनाने का अंतिम अवसर भी जाता रहा। उस अधिनियम के द्वारा प्रांतों की प्रभुसत्ता को इस प्रकार कुचल दिया गया कि इसका कोई अवशेष नहीं रहा जिसके आधार पर भारत में संघीय व्यवस्था की बात सोची जा सके। इस अधिनियम के आने के पश्चात् देश की सरकार एकल प्राधिकरण को सौंप दी गई है जिसकी जिम्मेदारी देश को सुशासन प्रदान करना है। चूंकि कोई एक प्रशासन केन्द्रीय कर्मचारियों की सहायता से इतने बड़े देश का शासन चलाने का भार सहन नहीं कर सकता था इसलिए प्रांतीय सरकारों को काफी शक्तियां दी गईं। लेकिन इससे इस तथ्य को नहीं छिपाया जा सकता कि प्रांत सही अर्थों में ‘‘भारत सरकार के एजेंट’’ थे। आम प्रयोग के कारण ‘प्रांतीय’ शब्द को प्रतिष्ठाजनक स्थान मिल गया। प्रांतीय राजस्व के साथ-साथ प्रांतीय सेवाएं, प्रांतीय सिविल कर्मचारी, प्रांतीय न्यायालय आदि शब्दों का भी प्रायः प्रयोग किया जाता था और ऐसा लगता था कि इन सभी चीजों का संबंध प्रांतीय सरकारों से है। लेकिन यह प्रयोग विडम्बनापूर्ण था। इसका कारण यह है कि देश के संवैधानिक कानून के प्रावधानों को याद करने पर हम उन्हें प्रभुसत्ता सम्पन्न अधिकरण समझने के बजाय यह कहना पसंद करेंगे कि उनमें राज्यपाल और परिषद् जैसी उच्च संस्थाएं होते हुए भी उन्हें सरकारें कहना उपयुक्त नहीं होगा। बहरहाल प्रांतीय सरकारों के पास कोई ऐसी कानूनी शक्तियां या कृत्य नहीं थे जो सरकार नामक राज्यतंत्रों के पास होने की आशा की जाती है। तथ्य यह है कि भारतीय राज्यतंत्र प्रणाली संघीय राज्यतंत्र प्रणाली के नितांत प्रतिकूल थी। भारतीय राज्यतंत्र प्रणाली एक केन्द्रीयकृत प्रणाली थी जिसमें कुछ भी प्रांतीय नहीं था, जो कुछ प्रांतीय दिखाई देता था वह साम्राज्यिक सरकार का क्षेत्रीय पहलू था। अतः भारत में प्रांतीय और केन्द्रीय सरकारों के बीच वित्तीय सम्बंधों को स्रोतों के विभाजन और प्रांतों की आय से अंशदान की संज्ञा देना गलत और अतिशोभनीय होगा। भारत में प्रांतों के कोई ऐसे पृथक संसाधन नहीं थे जो कानूनी तौर पर उनके अपने हों और इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि अपनी सेवाओं, जिसकी संविधान के कानून में कोई कल्पना नहीं की गई है, के लिए भुगतान करने के पश्चात् प्रांतीय सरकारें केन्द्रीय सरकार को अंशदान करती थीं।