प्रांतीय वित्तव्यवस्था का स्वरूप
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और प्रांत किसी भी सेवा के लिए कानूनी तौर पर उत्तरदायी नहीं थे, यहां तक कि प्रांतीयकृत कृत्यों के लिए भी प्रांतों की कोई कानूनी जिम्मेदारी नहीं थी। कानून के अनुसार पूरी जिम्मेदारी साम्राज्यिक सरकार के कंधों पर थी और साम्राज्यिक सरकार किसी प्रांत को इसे हस्तांतरित करके इस जिम्मेदारी से छुटकारा नहीं पा सकती थी। प्रांतों ने अपनी इच्छा से कुछ साम्राज्य सेवाओं के लिए वित्तीय जिम्मेदारी स्वीकार की थी। उन्हें ऐसी सेवाओं का संचालन करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता था। मद्रास ने 1877 में ऐसी जिम्मेदारी लेने से जिस असाधारण ढंग से इंकार किया उससे यह बात सिद्ध हो जाती है। अतः कानून के अनुसार देश में शांति, व्यवस्था और सुशासन के लिए भारत सरकार ही जिम्मेदार थी। अतः अनिवार्य रूप से सभी सेवाओं के लिए साम्राज्यिक सरकार जिम्मेदार थी जिनका संचालन अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन करने के लिए भारत सरकार करती थी।
अतः यह स्पष्ट है कि वह विचार जिसमें यह माना गया है कि ब्रिटिश भारत में केन्द्रीय और प्रांतीय सरकारों के बीच सम्बंध साधनों के विभाजन और प्रांतों की आय से अंशदान पर आधारित थे, तर्कसंगत नहीं है। इन दिनों प्रायः हर देश में सरकार परस्पर सम्बंधित राज्यतंत्रों द्वारा चलाई जाती थी और हर राज्यतंत्र का अपना-अपना क्षेत्र होता था जिसमें रहते हुए वे अपने सार्वजनिक कृत्यों का निर्वहन करते थे। यह हो सकता है कि कोई भी दो देशों में सरकार का काम चलाने वाले राज्यतंत्रों की संख्या एक-सी रही हो। परन्तु इस तथ्य के आधार पर यह कहना गलत है कि उनके आपसी सम्बंध भी एक से रहे होंगे। अतः इस तथ्य को ओर ध्यान दिलाना भी आवश्यक है कि परस्पर-सम्बंधित राज्यतंत्रों के बीच अच्छे सम्बन्ध होना इस बात पर निर्भर करता है कि उनमें से कौन-सा तंत्र कानून देने वाला राज्यतंत्र है। यह स्वीकार किया जाएगा कि ऐसे राज्यतंत्रों में एक राज्यतंत्र कई कारणों, विशेष रूप से ऐतिहासिक कारणों, से सर्वोच्च होता है क्योंकि यह अन्य राज्यतंत्रों को कानून देने में सक्षम होता है। संघीय देशों में कानून देने वाले राज्यतंत्र राज्य सरकारें हैं। उनका निर्णायक स्थान है। वे मूल तथा अवशिष्ट राजकीय शक्तियों के भण्डार हैं। वे स्वतंत्र अस्तित्व का दावा कर सकते हैं, वे अपने संसाधन प्राप्त कर सकते हैं और अपने कृत्यों का निर्वहन कर सकते हैं। दूसरी ओर, संघीय सरकार राज्य सरकारों की कठपुतली है। इसके पास केवल वे ही शक्तियां और कृत्य हो सकते हैं जो राज्य सरकारें अपने पास न रखकर इसे देती हैं। अतः राज्य और संघीय सरकारों के बीच वित्तीय सम्बंधों को संसाधनों के विभाजन तथा राज्यों की आय से अंशदान की संज्ञा दी जाए तो सही तथा उचित होगा। ख्1, इसका कारण यह है कि वहां पर
- वास्तव में यह आवश्यक नहीं है कि संघीय व्यवस्था हो। विकेन्द्रीयकरण की वैध प्रणाली समान रूप
से संसाधनों के विभाजन और राज्यों की आय से अंशदान के अनुकूल होगी।