230 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जा सकता है कि प्रांतों को जो कुछ दिया जाता था वह राजस्व होता था। ख्1, राजस्व के सभी स्रोतों से होने वाली वसूली पूरी तरह मिला दी जाती थी। अतः यह कहना उचित होगा कि प्रांतों को जो कुछ दिया जाता था वे निधियां होती थीं। आबंटन बजट, हस्तांतरित अथवा विभाजित राजस्व बजट जैसी अभिव्यक्तियां कुछ हद तक कल्पित वाक्यांश है। प्रांतीय वित्तव्यवस्था के सभी चरणों में प्रांतों को जो कुछ दिया जाता था वे निधियां होती थीं आबंटन चरण में जो धनराशि दी जाती थी वह निश्चित रूप से एक निश्चित राशि होती थी। अतः आबंटन और हस्तांतरित या विभाजित राजस्व में केवल यह अन्तर था कि जहां आबंटन के मामले में एक निश्चित राशि होती थी वहां हस्तांतरित या विभाजित राजस्व के मामले में कुल आय के अनुसार कम या ज्यादा हो सकती थी। लेकिन साथ ही यह केवल निधियों की आपूर्ति ही होती थीं। यह कहना भी गलत है कि प्रांतीय सरकारें जिन सेवाओं की जिम्मेदारी लेती थी भारत सरकार उन्हीं सेवाओं पर होने वाले व्यय को पूरा करने के लिए प्रांतीय सरकारों को धन देती थी। वास्तव में, प्रांतीय अंश समेत सभी सार्वजनिक धनराशि प्राप्त करने तथा इसे वितरित करने का काम भारत सरकार के हाथों में था। अतः तथ्यों के अनुसार सही अभिव्यक्ति यह कहना होगा कि प्रांतीय वित्तव्यवस्था से केवल यह अभिप्रेत था कि भारत सरकार अपने राजकोष के बहीखातों में एक प्रांतीय सेवा खाता खोल देती थी जिसमें जमाराशि हस्तांतरित या विभाजित राजस्व से हुई राशि के साथ बदल जाती थी और इसके अनुसार तथा इसमें से ही प्रांतीय सरकारें धनराशि निकाल सकती थीं।
इस प्रकार राजस्व के सभी स्रोत भारत सरकार के हाथों में थे। इस तथ्य से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रांत अपनी निधियों से अंशदान नहीं देते थे अपितु भारत सरकार अपने करों से होने वाली आय प्रांतों में बांटती थी। इसके अलावा कोई दूसरी स्थिति नहीं हो सकती। याद रहे कि 1833 के अधिनियम के अनुसार शांति, व्यवस्था और सुशासन जैसी सेवाओं के लिए वित्तीय जिम्मेदारी भारत सरकार के कंधों पर थी जबकि कुछ सेवाओं का संचालन सीधे भारत सरकार
- स्थानीय सरकारों को आबंटित राजस्व के सम्बंध में कैप्टन प्रेटीमैन, संसद सदस्य द्वारा इंग्लैंड में स्थानीय
कराधान सम्बंधी रायल आयोग के समक्ष अपने साक्ष्य में की गई टिप्पणी उद्धृत की जा सकती है। उन्होंने
कहा था ‘‘मेरा विचार है कि यह कहना असंभव है कि आप एक साम्राज्यिक कराधान के विशेष स्रोत
से अंशदान देते हैं। एक आदमी तालाब में पानी की बाल्टी फेंक सकता है और फिर तालाब से एक
बाल्टी पानी निकाल कर कह सकता है कि उसने पानी की वही बाल्टी निकाली है। कर साम्राज्यिक
राजकोष में दिये जाते हैं और अंशदान साम्राज्यिक राजकोष से किया जाता है। अतः यह कहना कि
आपने वही राशि निकाली है जो आप ने एक विशेष कर के रूप में जमा की थी तो मैं समझता हूं कि
यह एक भ्रामक कथन हैµ1898 का मामला 8763, साक्ष्य का कार्यवाही सारांश, खंड 1, प्रश्न 9873