प्रांतीय वित्तव्यवस्था का स्वरूप
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द्वारा किया जाता था। रूस को छोड़कर शेष यूरोप महाद्वीप के बराबर विशाल देश के कामकाज की सीधे देख-रेख करना एक केन्द्रीय ब्यूरो के लिए असंभव होने के कारण साम्राज्यिक सरकार की बहुत-सी सेवाएं प्रांतीय सरकार के पर्यवेक्षण में चलाये जाने के लिए प्रांतीय सरकार पर छोड़ दी गई थीं। जैसा कि पहले टिप्पणी की गई है। इस स्थिति की कमजोरी यह तथ्य था कि प्रशासनिक और वित्तीय जिम्मेदारी एक ही प्राधिकरण की नहीं थी जैसा कि होना चाहिए था। दूसरी ओर, हर वित्तीय वर्ष के अन्त में सभी प्रांतीय सरकारें जिन सेवाओं का संचालन करती थीं उन पर होने वाले व्यय के अनुमान भारत सरकार के वित्त विभाग को भेजती थीं और मांगी गई राशि देने न देने, उसमें कटौती करने का दायित्व भारत सरकार पर छोड़ दिया जाता था। धन जुटाने की जिम्मेदारी न होने के कारण, प्रांतीय सरकारें अत्यधिक धनराशि की मांग करती थीं और पूरा ब्यौरा उपलब्ध न होने के कारण भारत सरकार के लिए प्रत्येक सेवा के लिए वास्तव में आवश्यक धनराशि का अनुमान लगाना कठिन हो जाता था। इस बात के भय से कि भेजे गये आंकड़ों पर जरूरत से कम या ज्यादा विश्वास करने से वह अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल न हो जाए, भारत सरकार को प्रांतों द्वारा मांगी गई राशि स्वीकार करनी पड़ती थी। जैसा कि हमने देखा है, 1859 के संकट का यही कारण था। इस विपत्ति से बचने के लिए प्रांतीय वित्त व्यवस्था की स्थापना की गई जिसके अन्तर्गत भारत सरकार अपनी निधियों का वितरण प्रांतों में करती थी और प्रांत अपनी ओर से भारत सरकार के लिए उस राशि से कुछ सेवाओं का संचालन करते थे जो उन्हें इस प्रयोजनार्थ भारत सरकार से मिलती थी।
वित्तीय सम्बंधों का यह स्वरूप होने के कारण अनौचित्य के आधार पर प्रांतीय वित्तव्यवस्था की आलोचना करना अनुपयुक्त है। अंशदान तो योग्यता के अनुसार किये जाने चाहिए लेकिन स्रोतों का वितरण आवश्यकताओं के आधार पर होना चाहिए ताकि वे न्यायसंगत हों। यदि प्रांतीय वित्तव्यवस्था की अनौचित्य के आधार पर आलोचना की जाती है तो यह दिखाना भी आवश्यक है कि वितरण अनुचित है। इस संदर्भ में संभवतया यह भी दिखाना होगा कि विभिन्न प्रांतों को अपनी जनसंख्या या क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग धनराशि मिली। लेकिन यह याद रखना होगा कि राशि का वितरण मुख्य रूप से प्रांतों में नहीं अपितु विभिन्न विभागों में किया गया चाहे वे भारत सरकार के नियंत्रण में थे या प्रांतीय सरकारों के नियंत्रण में थे। इससे विभाजन की निष्पक्षता में काफी अन्तर हो सकता है क्योंकि विभिन्न प्रशासनिक राज्यतंत्रों के क्षेत्राधिकार में आने वाले क्षेत्रों की आवश्यकताएं अलग-अलग हो सकती हैं और यह आवश्यक नहीं है कि उनके अन्तर्गत आने वाले विभागों की आवश्यकताएं भी वैसे ही अलग-अलग हों। भारत सरकार द्वारा निधियों का वितरण प्रत्येक प्रांत को इसकी आवश्यकताओं के अनुसार किया