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प्रांतीय वित्तव्यवस्था का स्वरूप

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न ही बंबई का गवर्नर भारत की काउंसिल की अनुमति के बिना कोई ताला बनवा सकता था। ख्1, इससे जो काफी स्थायित्व आया उसे भी तब तक पूरी तरह महसूस नहीं किया जा सकता जब तक इस बात का ध्यान नहीं रखा जाता कि 1870 से पूर्व भारत सरकार के संसाधन पर्याप्त न होने पर कूड़ादान खरीदने से लेकर जनता की शिक्षा आदि के लिए तरह-तरह की विस्मयकारी मांगें की जाती थीं तो इनको स्वीकार करने अथवा अस्वीकार करने में उन्हें कितनी उलझन होती थी। प्रांतीय सरकारों को अपनी छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत सरकार पर निर्भर होने के कारण जो विलम्ब होता था तथा इनकी मंजूरी लेने में उनका जो अपमान होता था उससे वे बच गईं। दूसरी ओर साम्राज्यिक सरकार छोटी-छोटी मांगों पर विचार करने तथा उन्हें स्वीकार या अस्वीकार करने की परेशानी से बच गई क्योंकि साम्राज्यिक सरकार को हमेशा यह आशंका रहती थी कि कोई मांग स्वीकार या अस्वीकार करने से अन्याय न हो जाए। इस व्यवस्था से प्रांतों को आजादी तथा भारत सरकार को स्थायित्व ही नहीं मिला अपितु लापरवाही और फिजूलखर्ची, जो साम्राज्यिक व्यवस्था का अभिशाप बन गए थे, का स्थान उत्तरदायित्व और मितव्ययता ने ले लिया क्योंकि धनराशि के प्रयोग के मामले में प्रांतीय सरकारों पर प्रतिबंध लगाने के साथ-साथ भारत सरकार ने अपने ऊपर भी प्रतिबंध लगा लिये। यह सही है कि प्रांतीय वित्त व्यवस्था के आलोचक इन परिणामों से सन्तुष्ट नहीं हुए। इससे अन्य दिशाओं में अधिक लाभ होने की आशा थी लेकिन वह तभी संभव हो सकता था जब प्रांतीय वित्तव्यवस्था संगठन की दृष्टि से एक स्वतंत्र व्यवस्था होती। जब तक प्रांतीय वित्तव्यवस्था साम्राज्यिक वित्तव्यवस्था का एक अभिन्न अंग थी तब तक इस से बेहतर परिणामों की अपेक्षा नहीं की जा सकती थी और इसके जो परिणाम रहे हैं वे किसी तरह नगण्य या तुच्छ नहीं हैं।

तथापि प्रश्न यह रहता है कि जब प्रांतीय वित्तव्यवस्था के स्वरूप में परिवर्तन करना संभव नहीं था तो क्या प्रांतीय सरकारों द्वारा अपनी जिम्मेदारियों के सम्यक निर्वहन में किसी तरह हस्तक्षेप न करके भारत सरकार द्वारा प्रांतीय वित्तव्यवस्था पर लगाई गई सीमाओं को उदार बनाकर इसके कार्यक्षेत्र का विस्तार नहीं किया जा सकता था? प्रश्न के इस पहलू पर अगले अध्याय में विचार किया जाएगा।

  1. ईस्ट इंडिया कम्पनी के मामलों पर समिति की रिपोर्ट, 1852, खंड 10