8 प्रांतीय वित्त व्यवस्था का स्वरूप - Page 249

234 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

थीं और इसके लिए भारत सरकार की मंजूरी लेने की आवश्यकता नहीं

रही बशर्तें कि कुल व्यय उस वर्ष के बजट में निर्धारित राशि से अधिक

न हो।

स्थिति को स्पष्ट करने के प्रयोजनार्थ प्रांतीय सरकारों तथा भारत सरकार के बीच वित्तीय सम्बन्धों की तुलना हिन्दू संयुक्त परिवार प्रणाली से की जा सकती है जिसमें भारत सरकार परिवार की मुखिया थी। 1870 से पूर्व दोनों के प्रायः बराबर अधिकार थे। हिन्दुओं की पारिवारिक सम्पत्ति की तरह भारत के राजस्व का केन्द्रीय तथा प्रांतीय सरकारों के सभी विभागों द्वारा संयुक्त रूप से उपयोग किया जाता था और किसी के लिए कोई सीमा निर्धारित नहीं की गई थी। 1870 के पश्चात् केवल यह परिवर्तन किया गया कि राजस्व सहभोग्य नहीं रहे और सामूहिक सम्पत्ति में प्रत्येक की आवश्यकताओं के अनुसार प्रत्येक का हिस्सा निर्धारित किया गया। संयुक्त परिवार प्रणाली तो बनी रही यद्यपि परिवार के मुखिया अर्थात् भारत सरकार द्वारा अलग-अलग खाते खोले गये ताकि कोई सदस्य अपने नाम जमा राशि से अधिक राशि न निकाल सके।

क्या इस प्रयोजनार्थ इतना प्रयास करना वाजिब था? प्रांतीय वित्तव्यवस्था के जो परिणाम रहे उनके बारे में तरह-तरह के विचार व्यक्त किये गये हैं। लेकिन यदि हम पूर्ववर्ती बातों के आधार पर, जिनके कारण 1870 में यह व्यवस्था अस्तित्व में आई, विचार करें, जैसा कि हमें करना चाहिए तो यह नहीं कहा जा सकता कि आशाएं किसी तरह पूरी नहीं हुईं। कोई प्रतिकूल टिप्पणी तभी की गई जब प्रांतीय वित्तव्यवस्था के स्वरूप को ठीक तरह न समझते हुए आलोचकों ने ऐसे परिणाम प्राप्त करने का प्रयास किया जो इसके प्रवर्तकों ने कभी सोचे भी नहीं थे। लेकिन यदि हम इन गलतफहमियों को दूर करें और यह तथ्य न भूलें कि 1870 में प्रांतीय सरकारें स्वतंत्रता चाहती थीं और भारत सरकार स्थायित्व चाहती थी तो कोई भी यह नहीं कह सकता कि साम्राज्यवाद और संघवाद के बीच यह समझौता करने का प्रयास बेकार गया।

प्रांतीय सरकारों को इससे कितनी स्वतंत्रता मिली, यह बात यह महसूस करने पर ही समझी जा सकती है कि 1870 से पूर्व बंगाल का गवर्नरµ

‘‘सरकारी कर्मचारियों के भत्ते में कोई परिवर्तन नहीं कर सकता था ख्......., किसी नये

स्कूल की स्थापना नहीं कर सकता था अथवा एक दरोगा के वेतन में एक रुपये

की भी वृद्धि नहीं कर सकता था।’’ ख्1,

  1. कलकत्ता रिव्यू, संस्करण 3, पृष्ठ 169