9 प्रांतीय वित्त व्यवस्था का विस्तार - Page 253

238 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

किया था तो उन्हें ऐसी एजेंसियों में आवश्यक परिवर्तन करने के लिए शक्तियां प्रदान करने हेतु विश्वासपात्र क्यों नहीं समझा गया जो उन सेवाओं का प्रशासन करती थीं?

इसके अलावा यह पूछा गया कि प्रांतीय बजट को तैयार करने तथा उसे कार्यान्वित करने के लिए सीमित रखने का क्या औचित्य था? यदि प्रत्येक प्रांत के लिए समस्त भारत के साम्राज्यिक बजट में से अलग-अलग बजट बनाए जाने थे तो प्रांतों से यह मांग क्यों की गई कि वे अपने बजट भारत सरकार को प्रस्तुत करें? इस बारे में केवल सूचना देना तुलनात्मक रूप से साधारण मामला था। परन्तु भारत सरकार ने उनके अनुमानों को बदल देने का दावा क्यों किया तथा उन्हें यह बात मानने के लिए बाध्य किया कि वे भारत सरकार द्वारा निर्धारित अनुदानों को स्वीकार करें? प्रांतीय बजट की इस प्रकार की छानबीन प्रांतीय सरकारों पर किसी नीति को अपनाने का रूप था। यदि ऐसा था तो उन प्रांतों को पहल करने और स्वतंत्रता की क्या गुंजाइश रह गई थी जिनका कि प्रांतीय सरकारों को प्रोन्नत करने तथा स्थाई समझौतों को आश्वस्त करने का प्रमुख उद्देश्य था, फिर भी प्रांतीय सरकार को पूरक अनुदान के लिए भारत सरकार से निवेदन करने की क्यों आवश्यकता हुई जबकि प्रांतीय सरकार को जहां कहीं भी अनुदानों से अधिक राशि की आवश्यकता होती और उसे पुनर्विनियोग से पूरा नहीं किया जा सकता था और जबकि उसके पास अतिरिक्त मांगों को पूरा करने के लिए पर्याप्त राशि थी।

ऐसे प्रतिबंधों के लिए जिनसे प्रांतीय सरकारों के लिए बाधा उत्पन्न हुई और प्रांतीय वित्त के कार्यक्षेत्र को सीमित किया भारत सरकार के पास अनेक बहाने थे। ख्1, राजस्व के प्रतिबंधों के मामले में इस बात पर जोर दिया गया कि भारत सरकार के राजस्व संवैधानिक थे और उनके समुचित निपटान के लिए भारत सचिव (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट) तथा संसद उत्तरदायी थे। यदि ऐसी बात थी तो यह उचित था कि भारत सरकार को यह चाहिए कि प्रांतों को सौंपे गए स्रोत प्राधिकृत अनुदानों अथवा स्वीकृत सेवाओं पर हस्तांतरित नहीं किए जाने चाहिए। इसके अलावा सभी सेवाओं के लिए उत्तरदायी होने के कारण इसने इस बात का अनुसरण किया कि भारत सरकार को अपनी स्थिति को कमजोर नहीं करना चाहिए था जहां तक देश के संसाधनों को कर निर्धारण में विभाजन अथवा शक्तियों को लेने की प्रक्रिया द्वारा प्रबंध करने का संबंध था। भारत में कराधान का क्षेत्र काफी सीमित था। प्रतियोगी प्राधिकार द्वारा अंधाधुध कर लगाने से साम्राज्यिक करों में वृद्धि से या तो असंतोष उभरेगा अथवा साम्राज्यिक कराधान के

  1. इस सबंध में देखिए जे.एस. मेस्टन का साक्ष्य जो विकेन्द्रीयकरण पर रायल कमीशन के समक्ष प्रस्तुत

किया गया। मिट ऑफ एविड, खंड 10, क्यू. 44807-45336