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प्रांतीय वित्तव्यवस्था का विस्तार

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क्षेत्र में कटौती करनी पड़ेगी। ख्1, भारत सरकार ने अपने हाथ में ऋण लेने की शक्तियों को स्वयं में केन्द्रित किया जिसके अनुसार अखिल भारतीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अखिल भारतीय राजस्व को कानूनी तौर पर रहन रखना पड़ा। भारत सरकार प्रांतीय सरकार को उसकी अपनी आवश्यकताओं के लिए बंधक होने के निमित्त अपने राजस्व को काम में लाने की अनुमति नहीं दे सकीं। इसके अलावा यह आशंका ख्2, की गई कि यदि ऋण लेने की इस स्वतंत्रता की स्वीकृति दे दी गई तो अग्रिम रूप से राजस्व का रहन रखने का प्रलोभन असुविधाजनक रूप से शक्तिशाली हो सकता है तथा प्रांत का भावी प्रशासन वंचित रह सकता है क्योंकि पूर्व सरकार कतिपय महंगी महत्वाकांक्षाओं और अनुत्पादन परियोजनाओं को शुरू करने में शीघ्रता करती।

इसके अलावा यह बताया गया कि भारत में ऋण का बाजार इतना सीमित था जितना देश में कर निर्धारण की क्षमता। इसलिए यदि कई बाल्टियां एक ही कुएं से पानी खींचती हैं और सूखे की स्थिति में पानी की आपूर्ति कम हो जाती है तो स्पष्टतया कुएं का मुख्य स्वामी पानी निकालने का कार्य अपने हाथों में ले लेगा। ख्3,

कर्मचारियों और प्रतिष्ठानों के संबंध में खर्चे शक्तियों पर विशिष्ट प्रतिबंधों के मामले में भारत सरकार का बचाव यह था कि ये प्रतिबंध समरूपता और अर्थव्यवस्था के हित में आवश्यक थे। इस बात पर बल दिया गया कि यदि प्रत्येक प्रांत को यह स्वतंत्रता दी जाए कि वह उस लोक सेवा के पारिश्रमिक को नियमित करें जिसने प्रशासन का वास्तविक कार्य किया था तो इसका परिणाम शायद समान कार्य के लिए असमान वेतन देना होगा। इसके परिणामस्वरूप राज्य के कर्मचारियों में असंतोष फैलने का भय होगा जबकि राज्य के लिए यह वांछनीय था कि अच्छे प्रशासन के हित में इसको रोका जाए। इसके अलावा प्रांतों को अपने प्रतिष्ठानों में फेर बदल करने की पूर्ण स्वतंत्रता दे दी गई थी। इससे प्रांतों के आवर्ती व्यय में काफी वृद्धि हो जाएगी और फलस्वरूप प्रांतीय तथा साम्राज्यवादी वित्त के स्थायित्व में संकट की स्थिति पैदा हो जाएगी क्योंकि भारत सरकार अपने अंतिम प्रयास की दृष्टि से प्रांतीय सरकारों को बनाए रखने के लिए उत्तरदायी थी।

प्रांतीय बजट तैयार करने और उसे कार्यान्वित करने पर नियंत्रण के मामले में भारत सरकार ने इस बात पर जोर दिया कि उसकी जांच पड़ताल का इरादा यह नहीं

  1. 1870 और 1879 के बीच में जब प्रांतों को स्थानीय कराधान में स्वतंत्रता थी तो सभी ने पहले ही से

कराधान के अधिक भार का चयन किया था जैसे कि उनके कराधान के लिए भूमि। 2. आर.सी.डी., मिट. ऑफ एविड, खंड 10, क्यू. 45310

  1. भारत संवैधानिक सुधारों की रिपोर्ट, सी.डी. 9109, 1918, पृष्ठ 64 इसके बाद इसे संयुक्त रिपोर्ट कहा

जाएगा।