240 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
था कि अवांछनीय नीति ख्1, का नियंत्रण किया जाए, परन्तु यह अनिवार्य था क्योंकि इसके लिए तीन ऐसे महत्त्वपूर्ण बंधन थे जिनके द्वारा प्रांतीय बजट को भारत सरकार के बजट के साथ बांधा जा सके। वे बंधन इस प्रकार थेःµ (1) प्रांतीय सरकारों की आय और व्यय को भारत सरकार के बजट तथा, वार्षिक लेखाओं को सम्मिलित कर उसका अभिन्न अंग बनाना (2) राजस्व और व्यय के अलग-अलग शीर्षों की पद्धति और (3) केन्द्रीय और प्रांतीय सरकारों के लेन-देन के लिए समेकित अर्थोपाय के रूप में एक सामान्य कोष। परस्पर संबंध की प्रथम दो बातों की आवश्यकता यह थी कि भारत सरकार को प्रांतीय सरकारों के बजट के अनुमानों की जांच करनी चाहिए। इस बात पर जोर ख्2, दिया गया कि स्थानीय सरकारों द्वारा अपना व्यय अधिक दर्शाने तथा अपने राजस्व को कम दर्शाने को ध्यान में रखते हुए इनमें यथोचित परिवर्तन करने की शक्ति प्राप्त होनी चाहिए। वास्तविक आंकड़ों से व्यापक रूप से अलग अनुमानों को अनुपयुक्त वित्त समझा गया और उन्हें कोष की कार्यविधि के लिए व्यापक उपाय और साधन के रूप में माना गया। परंतु यदि यह प्रवृत्ति न भी होती तो भारत सरकार के लिए आवश्यक था कि प्रांतीय अनुमानों की जांच की जाए ताकि सम्मिलित लेखाओं में शुद्धता सुनिश्चित की जाए। शुद्धता के हितों के अलावा भारत सरकार को उनके अनुमानों की जांच द्वारा यह सुनिश्चित करना था कि प्रांत ने अपने बजट में व्यय में उन को तो सम्मिलित नहीं किया है जिनके लिए उचित प्रशासनिक अनुमति प्राप्त नहीं की गई है अथवा वर्ष में व्यय की जाने वाली ऐसी अनुमति समय के भीतर ही प्राप्त किए जाने की संभावना नहीं है अथवा बहुत अधिक व्यय दिखा कर प्रांत ने अपने शेष राजस्व को कम तो नहीं दर्शाया है और अपने वित्त की स्थिरता को भंग तो नहीं किया है। परंतु इससे भी सबसे बड़ा कारण यह था कि भारत सरकार को प्रांतीय अनुमानों की जांच क्यों करनी पड़ी जो इस तथ्य में निहित है कि कुछ लेखाओं के कुछ शीर्षों में भागीदारी की गई थी और केन्द्रीय बजट लाभ का है या घाटे का अंतिम परिणाम उसके अनुमान की शुद्धता पर आधारित था। इस बात पर बल दिया गया कि इस प्रकार भारत सरकार प्रांतीय बजट में प्रत्यक्ष रूप से रुचि रखती थी तथा उसने गंभीर रूप से अव्यवस्थित की गई अपनी बजट पद्धति को उद्भासित किए बिना उसकी जांच करने का अधिकार नहीं छोड़ा था। पारस्परिक संबंध की तीसरी बात के लिए यह आवश्यकता थी कि प्रांतीय सरकारें भारत सरकार से अंतिम रूप में निर्धारित अनुदानों के भीतर ही कार्य करें। प्रांतीय सरकारों को इस स्वतंत्रता की अनुमति दी गई थी कि वे अनुदानोंं से
आर.सी.डी., मिट. ऑफ एविड, खंड 10, क्यू. 44981
आर.सी.डी. मिट. ऑफ एविड, खंड 10, क्यू. 44863