242 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
रूप से सक्षम उच्च प्राधिकारी भी हो तो उसे कार्य सौंपने से सरकारी सोपान पद्धति के अनुसार निचले वर्ग के हाथों में शक्ति का हस्तांतरण सबसे अधिक सहायक होगा और केन्द्रीय विभाग में अधिक काम जमा न होगा। इस प्रकार केन्द्रीयकरण जब तक अधिकांशतया परिसीमित नहीं किया जाता इससे अक्षमता पैदा होगी। निश्चय ही यह समरूप राज्यों में भी होता और भारत जैसे देश में होता जहां यूरोप के समग्र महाद्वीप की अपेक्षा जाति, भाषा, धर्म, रीति-रिवाज और आर्थिक दशाओं में कहीं अधिक विषमताएं हैं। ऐसी परिस्थितियों में ऐसी बात होनी चाहिए जहां उच्च प्राधिकारी निम्न प्राधिकारी की अपेक्षा कम दक्ष हो सकता है क्योंकि वह किसी भी संभावना से सभी स्थानीय दशाओं का वांछनीय ज्ञान नहीं रख सकता। इसलिए यह स्पष्ट था कि समस्त भारत के लिए केन्द्रीय सरकार को ऐसा नहीं कहा जा सकता था कि उसे भारत के अलग-अलग प्रांतों में प्रचलित विभिन्न प्रकार की दशाओं का ज्ञान और अनुभव प्राप्त है। इसलिए प्रांतीय सरकारों की अपेक्षा केन्द्रीय सरकार आवश्यक रूप से ऐसी प्राधिकारी हो गई जो प्रांतीय प्रशासन के मामलों को निभाने में अपेक्षाकृत कम योग्य ख्1, थी। प्रांतीय सरकारों के सदस्यों को निचले स्तर का नहीं कहा जा सकता था तथा वे सामान्य रूप से केन्द्रीय सरकार के सदस्यों के बराबर योग्य थे जबकि वे ज्ञान की दृष्टि से अवश्य ही अधिक श्रेष्ठ थे।
इन तर्कों का भारत सरकार केवल यही उत्तर दे सकी कि उसने सभी शक्तियों को अपने हाथ में केन्द्रित कर लिया जिसके पीछे कोई सिद्धांत न था अपितु आवश्यकता थी। यह स्थिति उसके संवैधानिक दायित्वों से निश्चय ही उभरी, कानून ने निगरानी, मार्ग-दर्शन और नागरिक तथा सैन्य सरकार के नियंत्रण तथा देश के राजस्व की सुव्यवस्था तथा प्रबंधन पर बल दिया। इसलिए यह उन शक्तियों पर अपना नियंत्रण शिथिल नहीं कर सकी जो प्रांतीय सरकारों को दी गई थी। अलबत्ता यह संभव न था कि इस तर्क की शक्ति को नकारा जाए जब तक भारत सरकार संसद के प्रति एकाकी उत्तरदायी रही, यह विचार करना युक्तिसंगत था कि उसे उन सभी मामलों
- इस संबंध में यह रोचक बात होगी यदि श्री ए.सी. लोगन द्वारा किए गए अर्ध-गंभीर सुझाव की ओर
ध्यान आकर्षित किया जाए। इस सुझाव में श्री ए.सी. लोगन ने यह तर्क दिया कि यदि विकेन्द्रीयकरण
प्रभावों नहीं हो सकता तो भारत सरकार के संविधान को पुनः स्वस्थ करने का एक वैकल्पिक उपाय
यह है कि वर्तमान विभागों के स्थान पर विभिन्न स्थानीय क्षेत्रों के विभाग किए जा सकते हैं। जिनमें
से प्रत्येक विभाग का अपना सचिव और सदस्य हो सकता है। इस प्रकार बंबई का विभाग होना चाहिए
और इसके लिए उस प्रांत द्वारा नियुक्त सचिव तथा सदस्य होना चाहिए जो बंबई के सभी मामलों को
निपटाए और इसी प्रकार की व्यवस्था अन्य (छः) प्रांतों में भी होनी चाहिए। इस प्रकार गवर्नर जनरल
की देखरेख में प्रत्येक प्रांत का प्रशासन कलकत्ता से भी हो सकता है।
देखिएः आर.सी.डी., मिट. ऑफ एविड, खंड 8, 35531