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परिवर्तन की आवश्यकता

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इस तरह से एकत्र किया गया राजस्व पुलिस, सेना और प्रशासन आदि सेवाओं पर व्यय किया जाता है जो व्यवस्था बनाए रखने के लिए किए जाते हैं। ऐसी सेवाएं यथा शिक्षा, उद्योग आदि पर शायद ही सरकार कुछ व्यय करती हो क्योंकि यह व्यय अनुत्तरदायी कार्यपालिका द्वारा किया जाता है। परन्तु यह पूछा जा सकता है कि प्रभुसत्ता सम्पन्न कार्यपालिका प्रगति की अपेक्षा व्यवस्था बनाए रखने के क्यों हित में थी? इसका उत्तर यह है कि सरकार भले ही प्रभुसत्ता सम्पन्न क्यों न हो, प्रगति करने में अक्षम है।

इसका कारण यह है कि प्रभुसत्ता सम्पन्न शक्तियों का प्रयोग करते समय दो अत्यंत गंभीर मर्यादाएं आड़े आती हैं। ख्1, सर्वप्रथम आंतरिक सीमा है जो ऐसे लोगों की प्रकृति स्वभाव और हितों से उभरती है जो सत्ता में हैं। यदि सुल्तान मुस्लिमवाद का उन्मूलन नहीं करता, पोप कैथोलिकवाद पर प्रतिबंध नहीं लगाता, ब्राह्मण जातिप्रथा की भर्त्सना नहीं करता अथवा ब्रिटिश संसद अभिजात वर्ग के लोगों के संरक्षण को अवैध घोषित नहीं करती तो इसका कारण यह नहीं है कि वे ऐसा नहीं कर सकते परन्तु इसका कारण यह है कि वे ऐसा नहीं करेंगे। इसी प्रकार यदि भारत में कार्यपालिका प्रगति के लिए सबसे सरल उपाय नहीं करती तो उसका कारण था कि वह अवैयक्तिक ख्2, है और अपनी प्रवृत्ति उद्देश्य और हित के कारण है तथा वह भारतीय समाज में काम करने वाली जीवित शक्तियों के साथ सहानुभूति नहीं रखती और उसे उसके अभावों, पीड़ा, लालसा तथा इच्छा से उत्तरदायी नहीं ठहराया तथा उसे अपनी भावनाओं का विरोधी बताया उसने शिक्षा को आगे नहीं बढ़ाया, स्वदेशी को नहीं सराहा अथवा ऐसी प्रत्येक

  1. इस विषय पर विशद विवेचन के लिए देखिए ए.वी. डाइसी, ला ऑफ द कांस्टीटयूशन, 1915, पृ. 74-82
  2. अवैयक्तिक होने का कारण यह है कि लोक सेवाओं की उच्च और नियंत्रक मानदंड भारतीय प्रवृत्ति से

वंचित है। यद्यपि लोक सेवाओं में भरती के लिए भारत के लोगों की पात्रता बहुत पहले 1833 में स्थापित

की जा चुकी थी तथापि इस संबंध में भारत में लोक सेवाओं में प्रवेश के लिए भारत सचिव (सेक्रेटरी

ऑफ स्टेट) द्वारा बनाए गए विनियमों की प्रवृत्ति यह थी कि उन्हें कानून द्वारा दिए गए अधिकार के

अनुरूप रोजगार से वचित करना था। इन नियमों के अंतर्गत जिन्हें युद्ध के लिए भारत सचिव (सेक्रेटरी

ऑफ स्टेट) ने बनाया था कि सेवा में कमीशन के लिए उम्मीदवार विशुद्ध यूरोपीय वंश के लोग ही होते

थे और इसी प्रकार एडमिरेलिटी ने नौसेना के कैडेट होने के बारे में विनियम बनाया था जिसके अनुसार

भारतीयों को इस नौकरी से वंचित कर दिया गया था। जहां तक नागरिक सेवा का संबंध है, इस कानून

भारत सरकार अधिनियम, 1858 (गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1858) धारा 32 में यह बताया गया है

कि सम्राट के अधीन क्षेत्रों में स्वाभाविक रूप से जन्मे सभी लोग परीक्षाओं में प्रवेश पा सकते हैं और

इस प्रकार भारत के लोगों को भी शामिल किया गया परन्तु भारत सचिव (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट) ने यह

नियम बनाया कि इस प्रकार की परीक्षा केवल लंदन में ही होनी चाहिए जिसके फलस्वरूप अप्रत्यक्ष

रूप से इस कानून के अंतर्गत देश के अनेक लोगों को इस लाभ से वंचित कर दिया गया। अन्य लोक

सेवाओं में प्रवेश पाने के लिए बनाए गए विनियम विविध प्रकार के थे। जहां तक भारतीय चिकित्सा

सेवा का संबंध है इसके लिए उम्मीदवारों को यूरोपीय अथवा ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी का (ईस्ट

इंडियन वंश) का जन्मा व्यक्ति हो, भारतीय पुलिस सेवा के लिए यूरोप में जन्मा ब्रिटिश होना चाहिए,

वन सेवा के लिए यह अपेक्षित था कि उम्मीदवार ब्रिटिश प्रजा-रूप में जन्मे हों, लोक निर्माण विभाग

में 10 में से 1 व्यक्ति की सेवाओं में भारतीय लोग शामिल किए जा सकते थे जो ब्रिटिश शासन के

लोग थे। (देखिए इस संबंध में हेल्सबरी कृत लौज ऑफ इंगलैंड, खंड 10, पृ. 588-9)।