258 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
परन्तु नमक कर ही असमानता का ऐसा उदाहरण नहीं है जिन्हें जनता ने उन वर्गों के लिए अदा किया। भारत में जो भू-राजस्व लगाया जाता था उसमें भी भारतीय कराधान पद्धति की दृष्टि से और भी असमानता का एक अन्य उदाहरण है। कर असमानता के अनेक स्रोत हैं। सर्वप्रथम यह स्पष्ट तथ्य है कि कुछ मामलों में भू-राजस्व के संबंध में जो कर की राशि लगाई गई थी उसमें समय-समय पर संशोधन किया गया अब ऐसी कोई ऐच्छिक परिस्थिति नहीं है कि कुछ लोगों को देश की बढ़ती हुई आवश्यकताओं की दृष्टि से उनके अंशदान ख्1, की छूट दी जाए जबकि उनके साथियों से कठोरता से अंशदान का भुगतान कराया जाता है।
यह उन व्यक्तियों के प्रति अन्याय का एक पहलू है जिनकी भू-राजस्व के संबंध में कर देने की क्षमता को समय-समय पर संशोधित किया जाता है। अन्याय का एक अन्य पहलू है जिसके अनुसार भुगतान करने की क्षमता को गलत कानून से अपनाया जाता है। भारत में भूमिकर का संशोधनीय आय कर व्यवस्था में ही पाया जाता है और वह भूमि की निश्चित इकाई है। जैसा कि भारतीय वित्त के प्रत्येक विद्यार्थी को सुविदित है। किसी व्यक्ति ने इस पद्धति के हानिकारक प्रभाव के बारे में संदेह नहीं किया है जिसका आधार आधिपत्य में भूमि की इकाई पर कर निर्धारण माना है परन्तु वास्तव में शायद ही ऐसी कोई पद्धति हो जो विचार में भूल भरी हो अथवा व्यवहार में अधिक शरारतपूर्ण हो। यह ऐसे आम अर्थशास्त्रियों की अवहेलना करती है जो इस बात पर जोर देते हैं कि कर वस्तुओं द्वारा नहीं लगाए जाते अपितु व्यक्तियों द्वारा लगाए जाते हैं। ख्2, यदि लोग अंततोगत्वा करों का भुगतान करते हैं तो यह स्पष्ट है कि उनके अपने आधिपत्य की भूमि के अनुसार कर नहीं देने चाहिए अपितु उस कुल आय के अनुपात में कर देने चाहिए जो वे प्राप्त करते हैं। इसके विपरीत भूमि की प्रत्येक यूनिट के विचार से कर निर्धारण की पद्धति उस गरीब किसान पर मालगुजारी लगाती है जिसके पास
खेती के लिए केवल एक एकड़ भूमि है और जमींदार से भी समान दर से कर लिया जाता है जबकि उसके पास सैंकड़ों एकड़ भूमि होती है तथा इस बात पर ध्यान नहीं दिया जाता कि दोनों की आय में बहुत अधिक अंतर है। अतः इस समान करारोपण से धनी और गरीब के बीच स्पष्टतया असमानता का व्यवहार दिखाई देगा।
यदि इस प्रकार व्यवस्था के अनुसार समानता का बलिदान करने से राजस्व की वसूली की गई और इस आय को प्रोन्नत प्रगति की सेवाओं पर व्यय किया गया तो इससे कुछ क्षतिपूर्ति तो हो जाएगी परंतु ऐसी बात नहीं थी।
1,2. देखिए इम्पीरियल तथा लोकल टैक्सेशन, सी 9528, सन् 1899 पृष्ठ 160 के वर्गीकरण और प्रभाव से
मुख्यतया संबंधित ज्ञापन में स्थानीय कराधान के रॉयल कमीशन की शर्तों पर प्रोफेसर कैनन द्वारा आलोचना।