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274 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

किया जाए। केवल एक अवसर पर सरकारों के दो तंत्रों की संरचनाएं थीं, उनमें से एक प्रांतीय थी और दूसरी केन्द्रीय जो कुछ अलग-अलग आधार पर निर्मित हुई थीं और 1909 के मार्ले-मिंटो सुधारों में जिनका उल्लेख किया जा चुका है। उन सुधारों के अधीन केन्द्रीय विधान-मंडल उन सरकारी सदस्यों के आधिपत्य में था जिन्होंने कार्यपालिका के सदस्यों के साथ चैम्बर में स्थाई बहुमत बना लिया था। प्रांतीय विधान-मंडलों में सरकारी सदस्यों के स्थाई बहुमत का सिद्धांत समाप्त कर दिया गया था। केन्द्रीय विधान-मंडल की तुलना में प्रांतीय विधान-मंडलों के संविधान में अंतर की दूसरी बात दोनों सरकारों की बजट प्रक्रियाओं में निहित थी। प्रत्येक केलेंडर वर्ष के प्रारंभ में वित्त सदस्य केन्द्रीय विधान-मंडल में अपने व्याख्यात्मक ज्ञापन के साथ अपने प्रारंभिक अनुमान प्रस्तुत करता था। बाद में किसी दिन वह ऐसी अन्य व्याख्याएं किया करता था जिन्हें वह आवश्यक समझता था। इन अनुमानों पर विधान-मंडल के सदस्य अपने प्रस्ताव प्रस्तुत करते थे जिनका संबंध (क) कराधान में परिवर्तन का प्रस्ताव (ख) ऋण का प्रस्ताव अथवा (ग) स्थानीय सरकार के अतिरिक्त अनुदान से होता था। भारत सरकार के बजट के विचार-विमर्श की पहली अवस्था उस समय समाप्त हो जाती थी जब इन प्रस्तावों पर मतदान हो जाता था। दूसरी अवस्था उस समय प्रारंभ होती थी जब अनुमानों पर ग्रुप (समूह) द्वारा विचार किया जाता था। इस अवस्था में भी सदस्यों को यह छूट थी कि वे राजस्व और व्यय के बारे में प्रस्ताव प्रस्तुत करें किन्तु प्रतिबंध यह था कि उन विषयों पर प्रस्ताव प्रस्तुत नहीं किए जा सकते थे जो विधान-मंडल में प्रक्रिया के नियमों के अनुसार विचार-वमर्श के लिए वर्जित थे। प्रस्ताव प्रस्तुत और मतदान होने के बाद वित्त सदस्य पूरी बहस पर विचार करता था और ऐसे परिवर्तन करता था जिन पर उसकी सहमति होती थी और इसके बाद अंतिम बजट प्रस्तुत करता था। इसके बाद तीसरी अवस्था में वित्त सदस्य कुछ प्रस्तावों को स्वीकार करने के कारण बताता था और बजट की बहस के दौरान जिन सुझावों को स्वीकार नहीं किया जाता था उनके भी कारण बताता था। इसके बाद बजट पर आम बहस होती थी परन्तु अंतिम बजट प्रस्तुत करने अथवा मत लिए जाने के बाद किसी भी प्रस्ताव के प्रस्तुत करने की अनुमति नहीं दी जाती थी। प्रांतीय विधान-मंडलों में बजट की प्रक्रिया कुछ अलग होती थी। पहली अवस्था में प्रांतीय अनुमानों का कच्चा मसौदा प्रारंभ किया जाता था और इसके साथ ऐसी अनुसूची संलग्न की जाती थी जिसमें सभी परियोजनाएं जिनका व्यय पांच रुपये से अधिक होता था शामिल की जाती थीं। इसे दो भागों में विभाजित किया जाता था, प्रथम भाग में सभी आबंटित अर्थात् अनिवार्य और व्यय की मदें होती थीं तथा दूसरे भाग में अनाबंटित अर्थात् अनावश्यक और व्यय की मदें शामिल की जाती थीं। भारत सरकार को बजट का मसौदा प्रस्तुत किया जाता था जो प्रांतीय सरकार के परामर्श से राजस्व के अनुमान ठीक करती थी और कुल