परिवर्तन का स्वरूप 275
ऐसे व्यय को निर्धारित करती थी जो प्रांतीय सरकार के लिए उपलब्ध किए जाते थे और यदि आवश्यकता होती तो अनुसूची के प्रथम भाग की मदों में परिवर्तन किया जाता था। जब परिवर्तित राजस्व और भारत सरकार द्वारा निर्धारित कुल व्यय के आंकड़े प्रांतीय सरकार को बताए जाते थे तो प्रांतीय सरकार की पहली अवस्था समाप्त हो जाती थी। दूसरी अवस्था उस समय प्रारंभ होती थी जब प्रांतीय सरकार द्वारा बजट का मसौदा प्रांतीय विधान-मंडल की समिति को प्रस्तुत किया जाता था। समिति में सरकारी और गैर-सरकारी सदस्यों की बराबर की संख्या होती थी। सरकारी सदस्य सरकार द्वारा नामांकित किए जाते थे और गैर-सरकारी सदस्य उनके साथियों द्वारा निर्वाचित किए जाते थे। प्रांतीय वित्त की कार्यपालिका के प्रभारी सदस्य द्वारा अध्यक्षता की जाती थी। समिति की कार्यवाहियां अनौपचारिक और निजी होती थीं तथा बहुमत से निर्णय लिए जाते थे। समिति का संबंध उस अनुसूची के दूसरे भाग तक की सीमित होता था जिसमें व्यय की अनावश्यक मदें शामिल की गई थीं किन्तु शर्त यह थी कि यह भारत सरकार द्वारा निर्वाचित कुल व्यय से अधिक नहीं होंगे। लेकिन यह उसके घटबढ़ करने के लिए स्तंभ थी तथा इसमें समय-समय पर नई मदें शामिल की जाती थीं। उसके परिवर्तन के निष्कर्ष निकालने पर समिति ऐसे परिवर्तनों की सूचना देती थी जो उसने अपनी सरकार के लिए बनाए थे। इसके साथ ही प्रांतीय बजट की दूसरी अवस्था समाप्त हो जाती थी। तीसरी व्यवस्था उस समय प्रारंभ होती थी जब प्रांतीय अनुमान कुल मिला कर वित्त के प्रभारी सदस्य द्वारा प्रांतीय विधान-मंडल को प्रस्तुत किए जाते थे। इसके बाद बजट पर पूर्ण सदन की समिति में विचार किया जाता था और बहस किए गए अनुमानों के प्रत्येक गुण पर प्रस्ताव प्रस्तुत किए जाते थे। जब सभी प्रस्तावों पर बहस हो जाती थी और उन पर मतदान कर लिया जाता था तो इस बहस के परिणाम को प्रांतीय सरकार को प्रेषित किया जाता था। परन्तु ये प्रस्ताव बाध्य नहीं थे। चौथी अवस्था उस समय प्रारंभ होती थी जब प्रांतीय सरकार अंतिम बजट प्रस्तुत करती थी और इस बारे में कारण स्पष्ट करती थी कि कतिपय मदें क्यों स्वीकार की गईं और विधान-मंडल द्वारा शेष सुझाव क्यों अस्वीकार किए गए। इसके बाद एक बहस की जाती थी परन्तु कोई भी प्रस्ताव इस अवस्था में सही नहीं होते थे तथा विधान-मंडल बजट पर विभाजित नहीं होता था। इसे उसी प्रकार स्वीकार कर लिया जाता था जैसा कि कार्यपालिका ने पारित किया था।
संविधान और केन्द्रीय तथा प्रांतीय सरकारों की प्रक्रिया में इन अंतरों से यह अनुमान नहीं लगाना चाहिए कि प्रांतीय सरकारें केन्द्र के अपने विधान-मंडलों में कम उत्तरदायी नहीं थीं। यह तथ्य है कि 1909 से प्रांतीय विधान-मंडल में सरकारी सदस्यों का बहुमत नहीं था जैसा कि केन्द्रीय विधान-मंडल में बहुमत था और यह ऐसा मामला नहीं था कि कार्यपालिका से इसके व्यावहारिक परिणामों का संबंध हो