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326 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

इसलिए हम भारत सचिव (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट) के इन विचारों की ओर उन्मुख होते हैं कि व्यय में कमी और कराधान में वृद्धि प्रांतीय वित्त को ठोस आधार देने के लिए एकमात्र उपचार है। ऐसे क्या अवसर हैं कि प्रांत व्यय में कमी और कराध ान में वृद्धि करेंगे जो उनकी सुरक्षा के लिए अधिक आवश्यक है? इस संबंध में यह ठीक है कि महान वित्त पोषक श्री जेम्स विल्सन के कथन को दोहराया जाए। उन्होंने कहा किःµ

‘‘वित्त केवल गणित नहीं है, वित्त एक महान नीति है। ठोस वित्तव्यवस्था के बिना

ठोस सरकार संभव नहीं है, ठोस सरकार के बिना ठोस वित्तव्यवस्था संभव नहीं है।’’

यदि उसमें कोई सत्यता है तो क्या प्रांतीय सरकारें मितव्ययता करेंगी अथवा नहीं करेंगी या कराधान की वृद्धि का सामना करेंगी। यह स्थिति इस बात पर निर्भर करती है कि क्या सुधार अधिनियम द्वारा प्रांतों में स्थापित सरकारी पद्धति ठोस पद्धति है अथवा नहीं। अब सरकार की प्रकृति क्या है जो सुधार अधिनियम के अधीन प्रांतों में स्थापित की जाती है? बोलचाल की भाषा में इसे द्विशासन की पद्धति कहते हैं। इसके अधीन प्रांत की कार्यपालिका पूर्ववत् गवर्नर इन काउंसिल में बनाने के बजाय अब गवर्नर युक्त काउंसिल (गवर्नर इन काउंसिल) और गवर्नर युक्त मंत्रिपरिषद् (गवर्नर इन मिनिस्ट्री) के बीच विभाजित की जाती है। इसके अधीन केन्द्र लिए गए विषय को प्रांतीय रूप में अंकित विषय को फिर विभाजित कर आरक्षित और अंतरित विषय माना जाता है। पहले प्रकार के विषय गवर्नर जनरल इन काउंसिल के अधिकार में होते हैं और दूसरे प्रकार के विषय गवर्नर इन मिनिस्ट्री के अधिकार में होते हैं। प्रांतीय कार्यपालिका के इन भागों में ‘‘आरक्षित विषयों की प्रभारी परिषद् पूर्ववत् प्रांतीय विधान-मंडल के प्रति अनुत्तरदायी रहती है और उसके द्वारा हटाए नहीं जा सकते। तथा इस अर्थ में गैर-संसदीय कार्यपालिका है। प्रांतीय कार्यपालिका का दूसरा भाग अर्थात् ‘‘अंतरित’’ विषयों का प्रभारी मंत्रालय की नियुक्ति प्रांतीय विधान-मंडल के चुने गए सदस्यों द्वारा की जाती है। ये सदस्य उस प्रांतीय विधान-मंडल के लिए उत्तरदायी बनाए जाते हैं जो न्यूनाधिक लोक मत पर आधारित होता है तथा उसके द्वारा हटाए जा सकते हैं और इस अर्थ में इसे संसदीय कार्यपालिका कहते हैं।

प्रांतीय विधान-मंडल प्रांतीय कार्यपालिका के दोनों भागों से सर्वोच्च है। इसे विधान बनाने की पूर्ण शक्तियां ही नहीं मिली हैं अपितु कानून की व्यवस्था करने के लिए भी पूर्ण तथा उन्मुक्त शक्तियां मिली हैं। प्रांतीय बजट के संबंध में इसके मतदान और स्वीकृत करने की शक्तियां पूर्ण हैं। यद्यपि इसकी व्यवस्था सुधार अधिनियम ख्1, में की गई है जो इस बात की अनुमति देता है किःµ

  1. भारत सरकार का अधिनियम, 1919, देखिए धारा 2 (2)(ए)