परिवर्तन की समालोचना 327
‘‘स्थानीय सरकार को ऐसी किसी मांग के संबंध में शक्ति प्राप्त होगी (राशि
की स्वीकृति) ताकि वह ऐसा कार्य करे मानो उसकी स्वीकृति दे दो गई हो,
चाहे स्वीकृति को रोका जाए अथवा प्रांतीय विधान-मंडल द्वारा संदर्भित मामले में
इसमें निहित राशि की कमी हो, यदि मांग का संबंध आरक्षित विषय से है [ यह
विषय गवर्नर युक्त काउंसिल (गवर्नर इन काउंसिल) के प्रभार में सौंपा गया है ]
और गवर्ननर ने यह प्रमाणित किया कि मांग द्वारा व्यवस्थित व्यय इस विषय में
उसमें उत्तरदायित्व निर्वहन करने के लिए आवश्यक है।’’
क्या ऐसी सरकार ठोस वित्त की समस्याओं का समाधान कर सकती है? यह स्पष्ट है कि इस द्विशासकीय कार्यपालिका के दो भागों को एक अर्थात् गवर्नर इन काउंसिल को व्यय के कम करने के लिए बहुत कम चिंतित होने की आवश्यकता है अथवा कराधान की वृद्धि की आवश्यकता है। यह संसद से अपना अधिवेशन प्राप्त करता है और इस प्रकार किसी भी नीति को अपनाने में मुक्त हैµ इसका समर्थन किया जाता है क्योंकि कर दाता के सबसे अच्छे हितों के लिए किसी संबंध के बिना गवर्नर की प्रमाणित करने की शक्ति द्वारा किया जाता है। संयुक्त रिपोर्ट के लेखकों ने यह देखा था कि विधानमंडल की इच्छाओं को दबा कर यह प्रमाणित करने की शक्ति गवर्नर इन काउंसिल की ओर से अनुत्तरदायी अपव्यय को प्रेरित करती थी और गवर्नर इन मिनिस्ट्रि को ऐसी समान शक्ति के साथ दान देने का प्रस्ताव किया था जिसे पूर्व स्थिति में प्रतिबंध के रूप में कार्य करना था। उस शक्ति में ऐसा उपबंध सम्मिलित किया जाता था जिसमें यह दिया गया था कि ‘‘आरक्षित’’ विषयों के हितों में भी कोई भी कराधान मंत्रालय की अनुमति के बिना किसी भी प्रांत में आरोपित नहीं करना चाहिए। ख्1, भारत में राजनीतिज्ञों का एक अतिवादी वर्ग है और यह वर्ग अपर्याप्त कर सुधारों को कम से कम कराने पर तुल गया है और इस वर्ग ने मंत्रियों को सोच समझ कर बलि का बकरा बनाने के लिए इस उपबंध को नापसंद किया तथा उन्हें लोगों के बीच अविश्वासी बना दिया। परन्तु उनके प्रतिद्व ंद्वी ‘‘नरमपंथी’’ ने जो अब अपने को ‘‘उदारवादी’’ कहते हैं, यह कोई भी नहीं जानता कि वे ऐसा क्यों कहते हैंµ देखा जाए तो स्पष्ट रूप से उस उपबंध का क्या अर्थ था? यदि इसे मूर्त्त रूप दे दिया जाता तो निस्संदेह मंत्रालय केवल बाध्य संस्था ही नहीं होती तो उस परिषद् को सलाह देती जिसे स्वीकार किया जाता अथवा रद्द किया जाता परन्तु बजट के व्यवस्थापन में सशक्त आवाज पाप्त कर लेता। इस तथ्य को ध्यानपूर्वक देखें कि किसी भी मंत्री को जब तक वह बजट के प्रस्तावों को संभव ठहराने की स्थिति मेंं न हो और इनमें वे प्रस्ताव भी हासिल किए जाएं
- संयुक्त रिपोर्ट, पैरा 256