ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन और वित्त प्रबंध 35
वर्ष पौंड पौंड
(1) (2) (3)
1852-53 28,609,109 27,976,735
1853-54 28,277,530 30,240,435
1854-55 29,133,050 30,753,456
1855-56 30,817,528 37,637,530
1856-57 31,691,015 31,608,875
1857-58 31,706,776 41,240,571
1792 से 1857 के बीच के समय का उल्लेख करते हुए श्री आर.सी. दत्त कहते हैं ‘‘यह देखा गया है कि यदि चौदह वर्ष तक घाटा हुआ तो 32 वर्ष लाभ के रहे। घाटा लगभग एक करोड़ 70 लाख का हुआ तो लाभ लगभग 4 करोड़ 90 लाख का। अतः भारतीय प्रशासन का कुल वित्तीय लाभ छियालीस वर्षों के दौरान 3 करोड़ 20 लाख का हुआ लेकिन भारत में इस धन की बचत नहीं हुई और ना ही इनका सिंचाई अथवा सुधार के अन्य कार्यों पर उपयोग किया गया। यह सारा धन कंपनी के शेयरधारकों को लाभांश का भुगतान करने के लिए इंग्लैंड भेज दिया गया और चूंकि भारत से धन का यह प्रवाह लाभांश का भुगतान करने में पर्याप्त नहीं था, अतः ऋण का योग बढ़ता गया जिसे भारत का सार्वजनिक ऋण कहा गया।’’ (1. आर.सी. दत्त, इंडिया अंडर अरली ब्रिटिश रूल, पृष्ठ 408)।
इंग्लैंड और भारत में दो विभिन्न तरीकों से ऋण लिया गया।
भारत में जब सरकार को धन की आवश्यकता पड़ती तो वह विज्ञापन निकालती कि निश्चित ब्याज दरों पर तथा निर्धारित शर्तों पर खजाने में ऋण के रूप में धन जमा कराया जा सकता है। जब तक इस प्रकार ऋण खुले रहे तो पार्टियां खुशी से धन जमा करती रहीं तथा पावती में ऋण-पत्र प्राप्त करते रहे। ऋण पर यह धन केवल भारत में ही लिया गया।
इंग्लैंड में अलग प्रणाली प्रचलित की गई, यह प्रणाली केवल संसद द्वारा इस प्रकार निर्धारित की गई थी जिसके द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी ने ही ऋण प्राप्त किया। अन्य निर्गतों के लिए बॉण्ड आदि प्रणाली निर्धारित की गई जिसके माध्यम से निगम ऋण प्राप्त करते थे तथा यह सभी गृह-ऋण-बॉण्डों के माध्यम से प्राप्त किया गया।
कंपनी के नियमों के अधीन भारत के सार्वजनिक ऋण से ही पूर्णतः युद्ध का व्यय-भार वहन हुआ।
हम इन दोनों ऋणों की प्रगति का उल्लेख अलग से करेंगे।