ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन और वित्त प्रबंध - Page 51

36 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

भारतीय ऋण

1792 में भारतीय ऋण 7,000,000 पौंड से कुछ अधिक था जो कि सात वर्षों में बढ़कर 10,000,000 पौंड हो गया। 1800 में यह ऋण कुल 1,342,854 पौंड ब्याज सहित 14,625,384 पौंड था। जब मराठों के साथ वैलेजली का युद्ध हुआ जिसमें यह ऋण एकदम बढ़कर 30,098,857 पौंड हो गया जिसमें 1807-8 में 2,339,087 पौंड ब्याज की राशि भी शामिल थी। शांति स्थापित होने के साथ ऋण की अदायगी के द्वारा ऋण को कम करने के प्रयास किये गये। इसी नीति के कारण 1810-11 में भारतीय ऋण घटाकर 1,503,434 पौंड के ब्याज सहित 22,545,843 पौंड कर दिया गया। लेकिन युद्ध नियम तथा शांति अपवाद हो गए और 1819-20 में नेपाल युद्ध तथा प्रथम मराठा युद्ध के कारण भारतीय ऋण बढ़कर 31,338,855 पौंड हो गया। 1823-24 में मध्यवर्ती शांति होने के परिणाम स्वरूप ऋण घट गया। लेकिन अगले वर्ष 1824-25 के प्रथम बर्मी युद्ध से यह ऋण बढ़कर 38,316,486 पौंड हो गया। 1835-36 में ऋण घटकर 3,18,21,118 पौंड हो गया। लेकिन भारत में सैनिक कार्यवाही की शृंखला जारी रही। अफगान युद्ध, दो सिख युद्ध, बर्मा के दूसरे युद्ध से यह ऋण बढ़ गया। जो बढ़कर 1852-53 में 52,313,094 पौंड तथा ब्याज 2,479,133 पौंड हो गया। 1853-54 में यद्यपि भारतीय ऋण घटकर 49,762,876 पौंड हो गया। 1853-54 में लोक निर्माण कार्य नीति प्रारंभ की गई जिसके परिणामस्वरूप 1855-56 में भारतीय ऋण बढ़कर 55,546,650 पौंड हो गया। 1857-58 में भारत में गदर मच गया अथवा स्वतंत्रता संग्राम हुआ जिससे यह ऋण बढ़कर 60,704,084 पौंड हो गया।

गृह बॉड ऋण (इंग्लैंड में)

1800 में 5 प्रतिशत ब्याज की दर से गृह बॉड ऋण की राशि 1,487,112 पौंड थी। वैलेजली के युद्धों से भी गृह ऋण पर प्रभाव पड़ा तथा 1807-08 में यह बढ़कर 4,205,275 पौंड हो गया, 1807-12 में गृह ऋण बढ़कर सबसे अधिक 5 प्रतिशत की दर से ब्याज सहित 6,565,900 पौंड हो गया। 1816-17 में ब्याज दर घटकर 4 प्रतिशत हो गई तथा इसमें और वृद्धि नहीं हुई। 1814-15 में यह ऋण घटकर 4,376,976 पौंड हो गया, ऋण के यदा-कदा कमी किए जाने के कारण 1840-41 में यह ऋण घटकर 1,734,300 पौंड हो गया। अफगान युद्ध तथा गदर के परिण् ामस्वरूप गृह बॉण्ड ऋण बढ़कर 3,894,400 हो गया। गदर की लागत 40,000,000 पौंड अतिरिक्त थी।

यह अत्यंत आश्चर्यपूर्ण बात है कि भारतीय ऋण की तुलना में भारतीय गृह बॉण्ड ऋण अत्यंत कम है लेकिन जब हमें यह ज्ञात होता है कि ईस्ट इंडिया