ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन और वित्त प्रबंध - Page 62

ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन और वित्त प्रबंध 47

कहा कि ‘‘दया, परोपकार, धार्मिक सहनशीलता तथा लाभ की भावना जागृत हो और उन विशेषाधिकारों की जानकारी भारतवासियों को दी जाए जिन्हें वे अंग्रेजों के समान प्राप्त करने के हकदार होंगे तथा सभ्यता के साथ-साथ समृद्धि भी प्राप्त करेंगे।’’

यह घोषणापत्र भारत में पढ़ा गया तथा इसे भारत का मैग्ना कार्टा समझा गया, मैग्ना कार्टा इसलिए नहीं कि इसमें जनता को प्रदत्त अधिकार निहित थे वरन वह एक महान दस्तावेज था।

फिर भी, इससे इंग्लैंड का भारत को दिये गये योगदान का अनुमान लगता है। इसी रूप में इंग्लैंड के भारत को शून्य योगदान की तुलना में भारत का इंग्लैंड को अत्यंत अधिक योगदान विस्मयकारी है। यदि इन्हें आर्थिक दृष्टि से देखा जाए तो दोनों ही सच्चे वक्तव्य हैं। लेकिन दूसरी दृष्टि से यदि भारत का योगदान न्याय एवं मानवता के रूप में नहीं मापा जा सकता तो इंग्लैंड के योगदान को अपार धन (सोने एवं चांदी) के पैमाने से नहीं मापा जा सकता। अंतिम वक्तव्य शब्दशः एवं आदर्श रूप में सत्य है। भारत के सोने एवं चांदी के भंडार में इंग्लैंड ने कुछ भी योगदान नहीं दिया है जबकि इसके विपरीत भारत को खाली कर दिया है। ‘‘दुनिया का ”ास’’ किया है।’’

उसका योगदान अलाभकर राज्य के रूप में हैµ लेकिन ठीक इसी प्रकार सिक्कों के रूप में इसे तोलना (माप करना) अत्यंत कठिन है।

‘‘अंग्रेज भारत में अपने विगत कार्यों को देख सकते हैं। यदि गैर संयत संतुष्टि से नहीं तो कम से कम सांविधिक गौरव से अवश्य। उन्होंने भारत के लोगों को मानवता का महान वरदान ‘‘शांति’’ दी है, उन्होंने प्राचीन सभ्यता वाले राष्ट्र को आधुनिक संस्थानों तथा जीवनचर्या के साथ लाकर पश्चिमी सभ्यता एवं शिक्षा आरंभ की। उन्होंने ऐसी प्रशासन व्यवस्था बनाई जिसमें समय के साथ-साथ सुधार और प्रगति की अपेक्षा है, जो प्रभावी एवं मजबूत है। उन्होंने अच्छे नियम व कानून बनाए तथा न्यायालयों की स्थापना की जिनकी पवित्रता आज धरती के किसी भी कोने में पूर्ण है। ये ऐसे परिणाम हैं जिनका कि भारत में ब्रिटिश कार्यों का कोई भी ईमानदार आलोचक प्रशंसा किये बिना नहीं रह सकता।’’

लेकिन क्या आर्थिक अभाव के लिए केवल पाशविक शांति पसंद की जाती है। इसका निर्णय प्रत्येक को स्वयं ही करना है।