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साम्राज्यवादी व्यवस्थाः इसका विकास और ”ास

भारत में साम्राज्यवादी शासन व्यवस्था वर्ष 1833 में शुरू हुई। इस व्यवस्था को स्थापित करने में संसद के दो मुख्य उद्देश्य थे। पहला उद्देश्य था न्याय और पुलिस व्यवस्था में व्याप्त बहुलता को समाप्त कर इनकी एक ऐसी सार्वभौमिक व्यवस्था कायम करना जो संपूर्ण भारत में एक समान रहे और इसके विभिन्न प्रारूपों को वर्गीकृत तथा व्यवस्थित किया जा सके। तात्कालिक व्यवस्था के अंतर्गत बहुलता होना स्वाभाविक था क्योंकि बंगाल ख्1,, मद्रास ख्2,, और बंबई ख्3, की प्रेसीडेंसियों के न केवल नागरिक तथा सैन्य शासन और राजस्व के प्रबंधन एवं आदेश के अधिकार क्रमशः उन प्रेसीडेंसियों के गवर्नरों में निहित थे बल्कि प्रत्येक गवर्नर को व्यक्तिगत रूप से शासित क्षेत्र में अच्छी व्यवस्था तथा नागरिक प्रशासन के लिए नियम व कानून बनाने तथा अध्यादेश एवं प्रतिबंध जारी करने के भी अधिकार प्राप्त थे। बशर्ते कि ऐसे नियम-कानून व अध्यादेश न्यायपूर्ण, तर्कसंगत तथा ब्रिटिश साम्राज्य के कानूनों का अतिक्रमण नहीं करते हों। इन प्राधिकारियों द्वारा लागू की गई कानून संहिता में अंग्रेजी संविधान के वे सभी उपबंध शामिल किए जाने चाहिए थे जो 1726 में जॉर्ज प्रथम के राजपत्र के माध्यम से भारत में लागू किए गए हैं और 1726 के बाद लागू किए गए अन्य अंग्रेजी कानून जिन्हें देश के विशेष हिस्से में लागू किया गया।

इतने विविध स्वरूप वाले कानून लागू करने का कार्य इतना कठिन साबित हुआ कि कलकत्ता के सर्वोच्च न्यायालय को इस प्रकार टिप्पणी करनी पड़ी किµ

‘‘लोगों के किसी विवादपूर्ण अधिकार के बारे में कोई व्यक्ति न तो विचार जाहिर

कर सकता है और न ही न्याय दे सकता है, जिसका सम्मान करते हुए उन लोगों

ने आशंका व्यक्त न की हो जो उस पर सवाल उठाना चाहते हैं, क्योंकि बहुत

थोड़ी सी जनता अथवा कार्यालयों में कार्यरत लोगों, यहां तक कि कानून अधि

कारियों से भी यह उम्मीद की जा सकती है कि वे कानून की भारतीय व्यवस्था

  1. 13 जीओ 3, 63, एस. 36

  2. 39 और 40 जीओ, 3, सी. 79, एस. 11

  3. 47 जीओ, 3, सैस 2, सी. 68, एस. 3