साम्राज्यवादी व्यवस्थाः इसका विकास और ”ास 81
इन कठोर करों से देश की उत्पादक क्षमताओं पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में अनुमान लगाए बिना क्या इन करों द्वारा उगाही गई राशि उन जन सुविधाओं पर खर्च की गई जिन्हें कर दाताओं के आर्थिक जीवन को समृद्ध बनाने वाला समझा गया था? विभिन्न सेवाओं पर दशकों में किए जाने वाले खर्चों के विभाजन को दर्शाने वाली निम्नलिखित सारणी पर दृष्टिपात करने से स्पष्ट हो जाएगा कि पूंजी किस तरह
खर्च की गई हैः µ
खर्चों का वितरण
कुल खर्च का औसत प्रतिशत वर्ष में
1809-10 1819-20 1829-30 1839-40 1849-50 1857
सेना 58.877 64.290 53.754 58.721 51.662 45.55 ऋणों पर ब्याज 18.010 12.805 12.124 9.756 10.512 7.19 नागरिक एवं राजनीतिक 7.221 8.900 9.575 12.296 8.902 9.62 न्यायिक 7.525 6.800 7.107 9.565 7.180 प्रांतीय पुलिस 1.991 2.093 1.535 2.062 2.062 9.38 भवन, किले इत्यादि 1.639 1.756 2.810 1.428 1.661
कर्नल साइक्स द्वारा लिखित ‘‘पास्ट, प्रजेंट एंड प्रोस्पेक्टिव फाइनेंसियल कंडीशन ऑफ ब्रिटिश इंडियाµजर्नल ऑफ द रायल स्टैटिस्टीकल सोसायटी’’, 1859, अंक 22, पृष्ठ संख्या 457
इन आंकड़ों में प्रमुख सेना पर हुए खर्चों के आंकड़े हैं और यद्यपि कुल वर्षों के दौरान इनमें कमी आई है, लेकिन फिर भी उन्होंने देश के कुल राजस्व का आधे से भी अधिक भाग का उपयोग किया है। लेकिन सेना की तुलना में अन्य मदों पर हुए भारी खर्च आंकड़े वास्तविक खर्चे के भार को नहीं दर्शाते हैं। उनमें ऋण पर ब्याज के आंकड़ों को सम्मिलित किया जाना चाहिए क्योंकि जो ऋण लिया गया था वह युद्ध के लिए लिया गया ऋण था। इस अवधि के दौरान भारत ईस्ट इंडिया कंपनी तथा देशी शक्तियों के बीच युद्ध का मैदान बन चुका था। दो मराठा युद्ध, तीन मैसूर युद्ध, बर्मा के साथ दो बार युद्ध, दो अफगान युद्ध और कर्नाटक युद्धों के अतिरिक्त अनेक छोटी लड़ाईयां भारत को ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश साम्राज्य के राज्यों में मिलाने की नीयत से लड़ी गईं। संसद का यह दावा था कि ईस्ट इंडिया कंपनी के राज्य ब्रिटिश साम्राज्य के ही राज्य थे, लेकिन यह याद रखना चाहिए कि इसने खरीद मूल्य के एक पैसे का भी भुगतान नहीं किया। दूसरी ओर इन लड़ाइयों का पूरा खर्च भारत को वहन करना पड़ा। जिससे उसके नगण्य स्रोतों पर और अधिक ऋण भार पड़ गया। भवनों तथा किलों के मद पर दिखाई गई राशि भी सेना पर हुए
खर्चों में ही जोड़ी जानी चाहिए, क्योंकि यह उसी का भाग थी। इन जरूरी खर्चों को जोड़ने पर हम पाते हैं कि यह देश अपनी बहुमूल्य अल्प राशि का 52 से 80 फीसदी भाग युद्ध सेवाओं पर बर्बाद कर रहा था। दूसरी ओर संभवतः यह तर्क दिया जा सकता है कि सेना पर हुए खर्चों का एक बड़ा भाग स्वयं भारतीयों के