1 साम्राज्यवादी व्यवस्था : इसका विकास और ह्रास - Page 97

82 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

खजानों में गया क्योंकि देश की सेना में भारतीयस जवान सेना का बड़ा भाग थे। ख्1, और यदि यूरोपीय तथा भारतीय सैनिकों के वेतनमान समान होते तो भारतीय सैनिकों को अवश्य लाभ मिलता यद्यपि इतने अध्कि सैनिक व्यय का कोई औचित्य नहीं था, लेकिन यूरोपीय तथा भारतीय सैनिकों के वेतनमान इतने असमान ख्2, थे कि यूरोपीय तथा भारतीय सैनिकों के औसतन चार भारतीय सैनिकों के बराबर वेतन मिलता था। अतः चाहे जन उपयोगिता की दृष्टि से देखें अथवा निजी रोजगार की दृष्टि से, इस खर्चे ने राज्य को राजस्व देने वाली जनता को कोई लाभ नहीं पहुंचाया।

ऐसा नहीं कहा जा सकता कि राजस्व के 10 फीसदी की खपत करने वाले नागरिक तथा राजनीतिक खर्चे से आर्थिक क्षति की भरपाई हो सकती हो। यह खर्चे भी भारतीय जनसंख्या पर नहीं किया गया था, जिसे इसका भार वहन करना पड़ा। विजय के परिणामस्वरूप भारतीय नागरिकों को दूसरे दर्जे का माना जाने लगा, लेकिन विजय ने भारतीयों के दर्जे को प्रभावित करने से कहीं अधिक उन्हें नुकसान पहुंचाया। इसने अंग्रेजों

  1. यह निम्न आंकड़ों से जाना जा सकता हैःµ

(सैनिक विद्रोह से पूर्व भारतीय सेना की शक्ति (संख्या)

यूरोपीय भारतीय कुल योग आर्टीलरी 6419 9138 15577 सैपर्स 110 3043 3153 कैवलरी 3456 30533 32989 इन्फ्रैंट्री 29760 188660 218420 कुल योग 38745 231374 270119 भारतीय सेना के पुनर्गठन पर मेजर जनरल हैनकाक की रिपोर्ट, 1859 का संसदीय परचा, पृष्ठ 21 2. यह निम्नलिख्ति सारणी से स्पष्ट हैःµ इन्फ्रेंट्री रेजिमेंट का मासिक व्यय

यूरोपीय सैनिक

अधिकारी विवरण कुल योग रुपये आना पाई रुपये आना पाई

37 अधिकारी 14734-14-3 21779-2-7 प्रतिष्ठान और कर्मचारी 4515-12-4

कमांड तथा अन्य भत्ते 2528-8-0

जवान

117 एन.सी.ओ. 2289-4-5

950 निजी सैनिक 11203-8-4 25999-8-0 राशन कपड़ा, तथा अन्य खर्चे 12506-11-3 ............

कुल योग 47778-10-7