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साम्राज्यवादी व्यवस्थाः इसका विकास और ”ास 83

के दिमाग में भारतीयों के लिए अविश्वास का बीज बो दिया। इस तरह पराजित और अविश्वास के पात्र भारतीयों को ब्रिटिश शासन के आरंभकाल से ही देश की उच्च प्रशासनिक नियुक्तियों से वंचित ही रखा गया। ख्1, (सारणी पृ. 86) इस अन्याय को दूर करने के उद्देश्य से ही संसद ने 1833 के कानून द्वारा यह प्रावधान कियाµ कि न तो तथाकथित सीमा क्षेत्रों के निवासी और न ही वहां रहने वाली ब्रिटिश सम्राट की प्रजा को मात्र धर्म, जन्म, स्थान, रंग अथवा इनमें से किसी भी आधार पर कथित कंपनी के तहत रोजगार, अथवा पद ग्रहण करने से वंचित नहीं किया जाएगा।’’ (धा. 87)

भारतीय सैनिक

अधिकारी विवरण कुल योग

रुपये आना पाई रुपये आना पाई

अधिकारी

26 यूरोपीय 986-2-1

20 भारतीय 940-0-0

प्रतिष्ठान व कर्मचारी 1,209-1-4 13,527-8-7

कमांड तथा अन्य भत्ते 1,517-5-2

जवान

140 एन.सी.ओ. 1,780-0-0

9,06-4-0

1,000 सिपाही 7,000-0-0

खर्चे 826-14-0

कुल योग 23,134-6-7

इस सारणी से यह स्पष्ट है कि भारतीय मद के तहत दिखाए गए 26 यूरोपीय अधिकारियों के वेतन और कमांड तथा अन्य भत्ते जिनकी कुल राशि 11,378-7-3 रुपये है घटा दी जाए, तो हम पाएंगे कि 1105 यूरोपीय को 47,778-10-7 रुपये वेतन मिलता था जबकि 1,160 भारतीयों को 11,755-15-4 रुपये ही मिलते थे।

लेकिन वास्तविकता यह है कि सैनिक विद्रोह के बाद तक किसी भी भारतीय को ऊंचे पद पर नियुक्त नहीं किया गया था, केवल उन पदों को छोड़कर जिनके लिए इस कानून के पारित होने के पहले तक वे सक्षम थे, क्योंकि निदेशक मंडल (कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स) ने इस कानून की व्याख्या करके भारत सरकार को आरंभ से ही सलाह दे दी थी।

‘‘व्यावहारिक तौर पर ख्.................., किसी प्रकार का विशेष अंतर नहीं पड़ेगा। अनुबंधित सेवा के लिए आबंटित स्थितियों और सरकारी प्रकृति की अन्य सभी स्थितियों में